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संदर्भ:

अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटता भारत: भाषाई पहचान को संवैधानिक मान्यता देने के लिए केंद्र सरकार का एक ऐतिहासिक और साहसिक कदम।

वर्तमान समाचार बिंदु

  • मंत्रिमंडल की मंजूरी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 'केरल' का नाम बदलकर 'केरलम' करने के प्रस्ताव को आधिकारिक हरी झंडी दे दी है।
  • प्रक्रिया और विधेयक: अनुच्छेद 3 के तहत अब संसद में एक विधेयक पेश किया जाएगा, जिससे संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन कर राज्य का नाम औपचारिक रूप से बदला जाएगा।
  • राजनीतिक प्रतिक्रिया: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस निर्णय को भाजपा और माकपा के बीच 'राजनीतिक समझ' करार दिया है, जबकि प्रधानमंत्री ने इसे जन-इच्छा का सम्मान बताया है।
  • पश्चिम बंगाल का मुद्दा: केरल के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बीच, पश्चिम बंगाल का 'बांग्ला' नाम करने का प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक कारणों (बांग्लादेश से समानता) और तकनीकी बाधाओं के कारण पुनः चर्चा और विवाद में गया है।

केरल से 'केरलम' क्यों और इसका महत्व:

  • भाषाई न्याय: मलयालम भाषा में राज्य का नाम सदैव 'केरलम' रहा है; यह परिवर्तन 'अंग्रेजी' प्रभाव को हटाकर स्थानीय भाषाई अस्मिता को गौरव प्रदान करता है।
  • सांस्कृतिक गौरव: यह निर्णय 'अपनी विरासत पर गर्व' करने के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के अनुरूप है, जो औपनिवेशिक काल के नामकरण को भारतीय संस्कृति के अनुसार पुनर्गठित करता है।
  • प्रशासनिक एकरूपता: राज्य विधानसभा द्वारा पारित दो सर्वसम्मत प्रस्तावों (2023 और 2024) को केंद्र द्वारा स्वीकार कर सहकारी संघवाद को मजबूती दी गई है।

राज्य का नाम बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया

  • मुख्य संवैधानिक अनुच्छेद: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 (Article 3) संसद को किसी भी राज्य का नाम बदलने, उसकी सीमाएं घटाने-बढ़ाने या नए राज्य के गठन की शक्ति देता है।
  • प्रक्रिया के मुख्य चरण
  • राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा: नाम बदलने का विधेयक संसद में पेश करने से पहले राष्ट्रपति की अनुमति अनिवार्य है।
  • राज्य की राय : राष्ट्रपति उस विधेयक को संबंधित राज्य की विधानसभा को विचार के लिए भेजते हैं।

विशेष नोट: राज्य की राय केवल 'सलाह' मात्र है; संसद उसे मानने के लिए बाध्य नहीं है।

  • संसद में प्रस्तुति: राष्ट्रपति की अनुमति के बाद विधेयक संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में पेश किया जा सकता है।
  • साधारण बहुमत: इस विधेयक को पारित करने के लिए केवल साधारण बहुमत (उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का 50% + 1) की आवश्यकता होती है।
  • राष्ट्रपति की सहमति: दोनों सदनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही नाम परिवर्तन प्रभावी हो जाता है।

आवश्यक संशोधन:

नाम बदलने के साथ ही संविधान की पहली और चौथी अनुसूची में संशोधन किया जाता है। इसे अनुच्छेद 368 के तहत 'संविधान संशोधन' नहीं माना जाता (यह सामान्य विधायी प्रक्रिया है)


इतिहास और पृष्ठभूमि:

  • प्राचीन साक्ष्य: 'केरलम' शब्द का इतिहास हजारों साल पुराना है; तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के अशोक के शिलालेखों में इसे "केरलपुत्र" और प्राचीन तमिल ग्रंथ "अकनानुरु" में भी संदर्भित किया गया है।
  • व्युत्पत्ति: विद्वानों के अनुसार, यह "चेर" (जुड़ना) और "अलम" (क्षेत्र) से बना है, जिसका अर्थ है 'समुद्र द्वारा निर्मित भूमि' कुछ इसे "केरम" (नारियल) की प्रचुरता से जोड़ते हैं।
  • ब्रिटिश प्रभाव: 'केरल' नाम ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजी उच्चारण की सुविधा के लिए प्रचलित हुआ था, जिसे अब मूल स्वरूप में लौटाया जा रहा है।

निष्कर्ष:

 यह निर्णय केवल नाम का परिवर्तन नहीं, बल्कि भारत की भाषाई विविधता और प्राचीन सांस्कृतिक पहचान को संवैधानिक ढांचे में प्रतिष्ठित करने का एक सशक्त प्रयास है। जहाँ 'केरलम' अपनी सांस्कृतिक विजय के निकट है, वहीं पश्चिम बंगाल की प्रतीक्षा यह स्पष्ट करती है कि राज्यों के नामकरण में भौगोलिक और कूटनीतिक संवेदनशीलताएँ भी उतनी ही निर्णायक होती हैं।