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संदर्भ

भारत रत्न के बाद, पद्म पुरस्कार देश के सबसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान हैं। इनकी स्थापना 1954 में की गई थी। प्रारंभ में इन्हें 'पहला वर्ग', 'दूसरा वर्ग' और 'तीसरा वर्ग' कहा जाता था, जिसे बाद में 1955 में बदलकर क्रमशः पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री कर दिया गया। 1954 से लेकर आज तक (1978-79 और 1993-97 के संक्षिप्त अंतराल को छोड़कर), ये पुरस्कार प्रत्येक वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित किए जाते हैं। यह सम्मान किसी भी जाति, व्यवसाय, पद या लिंग के भेदभाव के बिना 'विशिष्ट कार्यों' को मान्यता देने के लिए प्रदान किया जाता है।

पद्म पुरस्कार क्या हैं?

पद्म पुरस्कार तीन श्रेणियों में दिए जाते हैं:

  • पद्म विभूषण: 'असाधारण और विशिष्ट सेवा' के लिए (यह दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है)
  • पद्म भूषण: 'उच्च क्रम की विशिष्ट सेवा' के लिए।
  • पद्म श्री: किसी भी क्षेत्र में 'विशिष्ट सेवा' के लिए। ये पुरस्कार कला, सामाजिक कार्य, सार्वजनिक मामले, विज्ञान और इंजीनियरिंग, व्यापार और उद्योग, चिकित्सा, साहित्य, शिक्षा, खेल और नागरिक सेवा जैसे विविध क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिए जाते हैं।

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में भारत सरकार ने वर्ष 2026 के लिए पद्म पुरस्कारों की घोषणा की है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इस वर्ष कुल 131 व्यक्तियों को इन सम्मानों से नवाजेंगी।
  • इस वर्ष की सूची में कला जगत के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र, क्रिकेट जगत के नायक रोहित शर्मा, अभिनेता आर. माधवन और मलयालम सुपरस्टार ममूटी जैसे नाम शामिल होने के कारण यह विषय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

इन पुरस्कारों का महत्त्व

ये पुरस्कार केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में उनके निस्वार्थ योगदान का प्रतीक हैं। इनका महत्त्व निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  • यह 'अनसंग हीरोज' (अनाम नायकों) को पहचान दिलाता है।
  • समाज में उत्कृष्टता और नवाचार की संस्कृति को प्रोत्साहित करता है।
  • यह राष्ट्रीय एकता और सेवा भाव को सुदृढ़ करता है।

पुरस्कार के स्वरूप

पद्म पुरस्कार प्राप्तकर्ता को निम्नलिखित वस्तुएं प्राप्त होती हैं:

  • राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुहर वाला एक सनद (प्रमाणपत्र)
  • एक पदक जिसे विशिष्ट आयोजनों में पहनने की अनुमति होती है।
  • पुरस्कार के साथ कोई नकद राशि, भत्ता या रेल/हवाई यात्रा में छूट जैसी वित्तीय सुविधाएं नहीं दी जाती हैं।

संवैधानिक प्रावधान

  • भारत के संविधान के अनुसार, ये पुरस्कार राज्य द्वारा दिए जाने वाले सम्मान हैं। इन्हें अनुच्छेद 18(1) के तहत 'उपाधि' नहीं माना जाता।
  • संविधान की सातवीं अनुसूची और सरकार के कार्य संचालन नियमों के तहत, गृह मंत्रालय इन पुरस्कारों का समन्वय करता है।
  • पद्म पुरस्कार समिति का गठन प्रतिवर्ष प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता है।

पुरस्कार एवं अनुच्छेद 18 विवाद

संविधान का अनुच्छेद 18 'उपाधियों के अंत' की बात करता है। आलोचकों का तर्क था कि ये पुरस्कार लोकतांत्रिक समानता के विरुद्ध हैं और एक नया 'कुलीन वर्ग' पैदा करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: बालाजी राघवन बनाम भारत संघ (1996) के ऐतिहासिक मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

  • पद्म पुरस्कार 'उपाधि' नहीं बल्कि 'सम्मान' हैं।
  • ये अनुच्छेद 18 का उल्लंघन नहीं करते क्योंकि इनका उपयोग नाम के आगे या पीछे उपसर्ग/प्रत्यय के रूप में नहीं किया जा सकता।
  • यदि कोई व्यक्ति इनका उपयोग अपने नाम के साथ करता है, तो उससे यह सम्मान वापस लिया जा सकता है। अतः, यह समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है बल्कि 'योग्यता' (Merit) का सम्मान है।

वर्ष 2026 का सांख्यिकीय विवरण

वर्ष 2026 में कुल 131 पुरस्कारों की घोषणा की गई है:

  • पद्म विभूषण: 05
  • पद्म भूषण: 13
  • पद्म श्री: 113

राज्यवार वितरण

इस वर्ष भौगोलिक वितरण में विविधता देखी गई है:

  • सर्वाधिक विजेता: महाराष्ट्र (15) राज्य प्रथम स्थान पर है।
  • द्वितीय: तमिलनाडु (13) पुरस्कारों के साथ।
  • अन्य प्रमुख: उत्तर प्रदेश (11), पश्चिम बंगाल (11) और केरल (8)
  • न्यूनतम: पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों से एकल प्राप्तकर्ता शामिल हैं।

विश्लेषण

2026 की सूची का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि सरकार ने 'लोकतांतिकीकरण' पर जोर दिया है। इसमें केवल प्रसिद्ध फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों को जगह मिली है, बल्कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और वैज्ञानिकों को भी प्राथमिकता दी गई है। मरणोपरांत दिए गए पुरस्कार (जैसे धर्मेंद्र और वीएस अच्युतानंदन) उनके दीर्घकालिक प्रभाव को स्वीकार करते हैं।

आगे की राह

भविष्य में, इन पुरस्कारों की नामांकन प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और डिजिटल बनाने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि देश के दूर-दराज के क्षेत्रों में छिपी प्रतिभाएं राजनीति या पहुंच के अभाव में उपेक्षित रहें।

निष्कर्ष

पद्म पुरस्कार भारतीय संस्कृति और मेधा का गौरव हैं। यद्यपि ये संवैधानिक रूप से उपाधियां नहीं हैं, किंतु ये राष्ट्र की कृतज्ञता का सर्वोच्च माध्यम हैं। वर्ष 2026 की सूची समावेशिता और उत्कृष्टता का एक उत्कृष्ट मेल है, जो आने वाली पीढ़ी को देश सेवा के लिए प्रेरित करती रहेगी।

पद्म विभूषण 2026 विजेता:

क्रम संख्या

नाम

क्षेत्र

राज्य / देश

1

श्री धर्मेंद्र सिंह देओल (मरणोपरांत)

कला

महाराष्ट्र

2

श्री के टी थॉमस

सार्वजनिक मामले

केरल

3

सुश्री एन राजम

कला

उत्तर प्रदेश

4

श्री पी नारायणन

साहित्य और शिक्षा

केरल

5

श्री वी एस अच्युतानंदन (मरणोपरांत)

सार्वजनिक मामले

केरल

पद्म भूषण 2026 विजेता:

क्रम संख्या

नाम

क्षेत्र

राज्य / देश

1

सुश्री अलका याग्निक

कला

महाराष्ट्र

2

श्री भगत सिंह कोश्यारी

सार्वजनिक मामले

उत्तराखंड

3

श्री कल्लापट्टी रामासामी पलानीस्वामी

चिकित्सा

तमिलनाडु

4

श्री ममूटी

कला

केरल

5

डॉ. नोरी दत्तात्रेयुडु

चिकित्सा

संयुक्त राज्य अमेरिका

6

श्री पीयूष पांडे (मरणोपरांत)

कला

महाराष्ट्र

7

श्री एस के एम मयिलानंदन

सामाजिक कार्य

तमिलनाडु

8

श्री शतावरधानी आर गणेश

कला

कर्नाटक

9

श्री शिबू सोरेन (मरणोपरांत)

सार्वजनिक मामले

झारखंड

10

श्री उदय कोटक

व्यापार और उद्योग

महाराष्ट्र

11

श्री वी के मल्होत्रा (मरणोपरांत)

सार्वजनिक मामले

दिल्ली

12

श्री वेल्लापल्ली नटेशन

सार्वजनिक मामले

केरल

13

श्री विजय अमृतराज

खेल

संयुक्त राज्य अमेरिका

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन


संदर्भ

जनवरी 2026 में, मध्य प्रदेश के रातापानी टाइगर रिजर्व में पहली बार एक दुर्लभ एशियाई जंगली कुत्ता (ढोल) देखा गया है। इसके अलावा, विशाखापत्तनम के इंदिरा गांधी प्राणी उद्यान (IGZP) में स्थित भारत का एकमात्र 'संरक्षण प्रजनन केंद्र' अपनी आनुवंशिक विविधता बढ़ाने के लिए चेन्नई के वंडालूर चिड़ियाघर के साथ सहयोग कर रहा है। ये घटनाक्रम भारत के इस कम चर्चित लेकिन महत्वपूर्ण शिकारी के पुनरुद्धार की दिशा में मील का पत्थर हैं।

एशियाई जंगली कुत्ता (ढोल) क्या है?

  • ढोल कुत्ते के परिवार का एक सामाजिक और मांसाहारी वन्यजीव है।
  • इसे 'व्हिसलिंग डॉग' (सीटी बजाने वाला कुत्ता) भी कहा जाता है क्योंकि यह अपने समूह के साथ संवाद करने के लिए एक विशिष्ट सीटी जैसी आवाज निकालता है।

प्रमुख विशेषताएं और व्यवहार

  • शारीरिक बनावट: यह लाल-भूरे रंग का, मध्यम आकार का कुत्ता है जिसकी ऊंचाई लगभग 20 इंच होती है। इसकी पहचान इसकी घनी काली पूंछ और असाधारण रूप से मजबूत जबड़ों से होती है।
  • सामाजिक संरचना: ढोल झुंड में रहने वाले जीव हैं। इनके समूह का आकार 2 से 25 तक हो सकता है।
  • शिकार की तकनीक: ये बहुत ही रणनीतिक शिकारी होते हैं। ये अपने शिकार का तब तक पीछा करते हैं जब तक वह थक जाए। ये बेहतरीन तैराक और लंबी छलांग लगाने वाले जीव भी हैं।

आवास और वितरण

  • वैश्विक: यह मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया के जंगलों में पाया जाता है।
  • भारत में वितरण: भारत में ये मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में केंद्रित हैं:
    1. पश्चिमी और पूर्वी घाट (इनका सबसे मजबूत गढ़)
    2. मध्य भारतीय भूभाग (कान्हा, पेंच, रातापानी)
    3. उत्तर-पूर्व भारत (काजीरंगा-कार्बी आंगलोंग क्षेत्र)

संरक्षण स्थिति

ढोल को भारत में बाघों के समान उच्च स्तरीय कानूनी संरक्षण प्राप्त है:

  • IUCN रेड लिस्ट: लुप्तप्राय
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: अनुसूची-I
  • CITES: परिशिष्ट-II

अस्तित्व के लिए प्रमुख चुनौतियां

  • निवास स्थान का नुकसान: जंगलों के कटने से इनका प्राकृतिक आवास सिमट रहा है।
  • शिकार की कमी: हिरण और जंगली सूअर जैसे इनके मुख्य भोजन की संख्या कम होना।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष: मवेशियों पर हमले के कारण ग्रामीणों द्वारा इन्हें जहर देना या मारना।
  • रोग: पालतू कुत्तों से फैलने वाली बीमारियाँ (जैसे कैनाइन डिस्टेंपर)

संरक्षण के प्रयास और पहल

  • संरक्षण प्रजनन केंद्र (IGZP): विशाखापत्तनम में स्थित यह केंद्र ढोलों की संख्या बढ़ाने और उनके आनुवंशिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक विधि से काम कर रहा है।
  • कॉरिडोर संरक्षण: काजीरंगा और कार्बी आंगलोंग के बीच वन गलियारों की रक्षा करना, ताकि ये जीव स्वतंत्र रूप से आवाजाही कर सकें।

पारिस्थितिक महत्व

  • ढोल जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में एक 'टॉप प्रीडेटर' (शीर्ष शिकारी) की भूमिका निभाते हैं।
  • ये शाकाहारी जीवों की आबादी को नियंत्रित रखते हैं, जिससे जंगल की वनस्पति संतुलित रहती है।
  • ये अक्सर बाघों और तेंदुओं के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं, जो जैव विविधता के संतुलन के लिए आवश्यक है।

विश्लेषण

ढोल के संरक्षण की स्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर कुछ महत्वपूर्ण बिंदु उभर कर आते हैं:

  • बाघों की छाया में: भारत का अधिकांश संरक्षण बजट और ध्यान 'फ्लैगशिप स्पीशीज' जैसे बाघ और शेर पर केंद्रित रहता है। ढोल, जो उन्हीं जंगलों को साझा करते हैं, अक्सर नीतिगत प्राथमिकताओं में पीछे रह जाते हैं।
  • आनुवंशिक अलगाव: भारत में ढोल की आबादी छोटे-छोटे 'क्लस्टर्स' में विभाजित है। यदि इन समूहों के बीच संपर्क के लिए 'गलियारे' नहीं होंगे, तो इनब्रीडिंग के कारण इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाएगी, जैसा कि वर्तमान में विशाखापत्तनम केंद्र अपनी आनुवंशिक विविधता बढ़ाकर रोकने का प्रयास कर रहा है।
  • पारिस्थितिक सह-अस्तित्व: ढोल और बाघ के बीच का संबंध जटिल है। जहाँ ये एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी हैं, वहीं इनकी उपस्थिति यह संकेत देती है कि जंगल में शिकार पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।

आगे की राह

एक स्थायी भविष्य सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:

  • कॉरिडोर सुरक्षा: काजीरंगा-कार्बी आंगलोंग और पश्चिमी घाट के बीच के वन गलियारों को 'कानूनी संरक्षण' देना चाहिए ताकि ढोल का स्वतंत्र विचरण और आनुवंशिक विनिमय संभव हो सके।
  • टीकाकरण अभियान: पालतू कुत्तों से होने वाली बीमारियों (जैसे रेबीज और कैनाइन डिस्टेंपर) को रोकने के लिए वन क्षेत्रों के आसपास के गांवों में कुत्तों का अनिवार्य टीकाकरण किया जाना चाहिए।
  • सामुदायिक भागीदारी: 'मवेशी मुआवजे' की प्रक्रिया को सरल और त्वरित बनाना चाहिए ताकि किसान ढोल को अपना दुश्मन समझें और प्रतिशोध में उन्हें जहर दें।
  • प्रौद्योगिकी का उपयोग: रेडियो कॉलरिंग और कैमरा ट्रैपिंग के माध्यम से इनके मायावी व्यवहार और प्रवास पैटर्न का अधिक डेटा एकत्र करना चाहिए ताकि प्रभावी नीतियां बनाई जा सकें।
  • प्रजनन केंद्रों का विस्तार: विशाखापत्तनम मॉडल की सफलता को अन्य राज्यों (जैसे मध्य प्रदेश और कर्नाटक) में भी दोहराया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

एशियाई जंगली कुत्ता या 'ढोल' केवल एक शिकारी नहीं, बल्कि हमारे स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का एक 'संकेतक' है। इसकी उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि हमारा जंगल केवल हरा-भरा है, बल्कि जैविक रूप से समृद्ध भी है। 2026 की ये पहलें चाहे वह विशाखापत्तनम का ब्रीडिंग प्रोग्राम हो या रातापानी में इनकी नई खोज यह सिद्ध करती हैं कि संरक्षण के ईमानदार प्रयासों से हम इस मायावी शिकारी को विलुप्त होने की कगार से वापस ला सकते हैं।

"प्रकृति का संतुलन केवल बाघों से नहीं, बल्कि ढोल जैसे उसके सहायक शिकारियों की दहाड़ (या सीटी) से भी बना रहता है।"

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने अपनी वैश्विक रिपोर्ट "स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026" जारी की है। यह रिपोर्ट वैश्विक अर्थव्यवस्था और प्रकृति के बीच एक खतरनाक वित्तीय असंतुलन को उजागर करती है। रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि प्रकृति की रक्षा के लिए खर्च किए गए प्रत्येक 1 डॉलर के मुकाबले, उसे नष्ट करने वाली गतिविधियों पर लगभग 30 डॉलर खर्च किए जा रहे हैं।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

  • विशाल वित्तीय असंतुलन: 2023 में प्रकृति को नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों के लिए वित्तीय प्रवाह 7.3 ट्रिलियन डॉलर (वैश्विक जीडीपी का लगभग 7%) तक पहुँच गया। इसके विपरीत, प्रकृति-आधारित समाधानों (NbS) में निवेश केवल 220 बिलियन डॉलर था।
  • सार्वजनिक बनाम निजी वित्त: NbS वित्तपोषण का 90% हिस्सा सरकारी (सार्वजनिक) स्रोतों से आता है। निजी क्षेत्र का निवेश मात्र 10% है, जो मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन और भारी उद्योगों जैसे उच्च-प्रभाव वाले क्षेत्रों में केंद्रित है।
  • निवेश की आवश्यकता: रियो कन्वेंशन के लक्ष्यों (1.5°C तापमान सीमा और जैव विविधता हानि को रोकना) को प्राप्त करने के लिए, 2030 तक वार्षिक NbS निवेश को 2.5 गुना बढ़ाकर 571 बिलियन डॉलर करने की आवश्यकता है।
  • हानिकारक सब्सिडी (EHS): सरकारें सालाना लगभग 2.4 ट्रिलियन डॉलर की पर्यावरण के लिए हानिकारक सब्सिडी प्रदान करती हैं, जिसमें जीवाश्म ईंधन, अनुचित कृषि और जल सब्सिडी प्रमुख हैं।


महत्वपूर्ण शब्दावलियाँ

  • प्रकृति-सकारात्मक वित्त: वे निवेश जो पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली को बढ़ावा देते हैं (जैसे- वृक्षारोपण, आर्द्रभूमि संरक्षण)
  • प्रकृति-नकारात्मक वित्त: वे निवेश जो प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण करते हैं (जैसे- जीवाश्म ईंधन निष्कर्षण, वनों की कटाई, हानिकारक कृषि सब्सिडी)


प्रकृति-आधारित समाधान

NbS से तात्पर्य उन कार्यों से है जो पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, प्रबंधन और बहाली करते हैं, जिससे समाज के सामने आने वाली चुनौतियों (जैसे- जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा) का प्रभावी ढंग से समाधान होता है।

उदाहरण:

  • मैंग्रोव बहाली: तटों की रक्षा (आपदा प्रबंधन) + कार्बन सोखना (जलवायु परिवर्तन)
  • कृषि वानिकी: फसल की पैदावार बढ़ाना + मृदा स्वास्थ्य बनाए रखना।
  • शहरी हरित क्षेत्र: शहरों में बढ़ते तापमान को कम करना।

भारत के लिए निहितार्थ और चुनौतियाँ

भारत के संदर्भ में इस रिपोर्ट के परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

  • सब्सिडी का विरोधाभास: भारत में रासायनिक उर्वरकों और भूजल पंपिंग के लिए दी जाने वाली "प्रकृति-नकारात्मक" सब्सिडी, पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) के बजट से कहीं अधिक है। यह उस मिट्टी और जल स्तर को नष्ट कर रही है जिस पर अर्थव्यवस्था टिकी है।
  • सार्वजनिक वित्त पर अत्यधिक निर्भरता: भारत में अधिकांश NbS परियोजनाएं (जैसे- कैम्पा फंड) सरकारी हैं। निजी क्षेत्र का योगदान (CSR/प्रभाव निवेश) अभी भी नगण्य है।
  • जीडीपी जोखिम: भारत की 50% से अधिक कार्यबल कृषि पर निर्भर है। पारिस्थितिकी तंत्र (जैसे- परागण, जल स्तर) के पतन से भारत में वित्तीय अस्थिरता औद्योगिक देशों की तुलना में तेजी से सकती है।
  • ग्रीन टैक्सोनॉमी का अभाव: भारत अभी भी एक औपचारिक 'ग्रीन टैक्सोनॉमी' (वर्गीकरण प्रणाली) विकसित कर रहा है, जिसके अभाव में 'ग्रीनवाशिंग' (दिखावटी पर्यावरण प्रेम) का खतरा बना रहता है।

NbS को बढ़ावा देने के उपाय और अनुशंसाएँ

रिपोर्ट और विशेषज्ञों ने निम्नलिखित समाधान सुझाए हैं:

  • नेचर ट्रांजिशन एक्स-कर्व: UNEP ने एक दोहरी रणनीति का प्रस्ताव दिया हैहानिकारक वित्त प्रवाह को तेजी से कम करना और साथ ही प्रकृति-सकारात्मक बाजारों को बढ़ाना।
  • अनिवार्य प्रकटीकरण: कंपनियों के लिए प्रकृति पर उनकी निर्भरता और प्रभाव की रिपोर्ट करना अनिवार्य होना चाहिए (TNFD के अनुरूप)
  • नवाचारी वित्तीय उपकरण: निजी पूंजी जुटाने के लिए ग्रीन बॉन्ड, बायोडायवर्सिटी क्रेडिट और सस्टेनेबिलिटी-लिंक्ड लोन का विस्तार करना।
  • जोखिम कम करना: विश्व बैंक जैसे संस्थानों को निजी निवेशकों के लिए 'फर्स्ट-लॉस गारंटी' प्रदान करनी चाहिए।

भारत की प्रमुख पहलें

भारत ने प्रकृति-सकारात्मक वित्त की दिशा में कई कदम उठाए हैं:

  • मिष्टी योजना : तटरेखा के किनारे मैंग्रोव वृक्षारोपण के लिए।
  • अमृत धरोहर: रामसर स्थलों (आर्द्रभूमि) के संरक्षण के लिए सामुदायिक भागीदारी।
  • ग्रीन इंडिया मिशन: वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए।
  • अमृत सरोवर मिशन: जल निकायों का पुनरुद्धार।

निष्कर्ष

"स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026" एक चेतावनी है कि हमारी वर्तमान आर्थिक व्यवस्था पर्यावरण विनाश को वित्तपोषित कर रही है। भारत के लिए 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य तभी स्थायी होगा जब हम एक "प्रकृति-सब्सिडी वाली अर्थव्यवस्था" से हटकर "प्रकृति-सकारात्मक विकास मॉडल" की ओर बढ़ेंगे। सतत विकास के लिए पूंजी के प्रवाह को विनाशकारी गतिविधियों से हटाकर पुनर्स्थापनात्मक कार्यों की ओर मोड़ना आज की सबसे बड़ी वैश्विक आवश्यकता है।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

इतिहास में शिक्षा को हमेशा समाज की प्रगति का आधार माना गया है। 20वीं सदी तक शिक्षा का मुख्य लक्ष्य 'साक्षरता' और 'स्कूलों तक पहुंच' सुनिश्चित करना था। हालाँकि, 21वीं सदी के तीसरे दशक, विशेषकर 2026 तक आते-आते, वैश्विक विमर्श पूरी तरह बदल गया है। अब चुनौती बच्चों को केवल स्कूल भेजने की नहीं, बल्कि उन्हें भविष्य की अर्थव्यवस्था के अनुरूप 'सक्षम' बनाने की है। 2026 का यह समय 'सीखने के संकट' को दूर करने और तकनीक के मानवीयकरण का संधिकाल है।

यूनिवर्सल एजुकेशन क्या है?

यूनिवर्सल एजुकेशन का अर्थ केवल 'सार्वभौमिक नामांकन' नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी समावेशी व्यवस्था है जहाँ जाति, लिंग, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना प्रत्येक व्यक्ति को समान गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त हो। इसका उद्देश्य एक ऐसा वातावरण तैयार करना है जहाँ 'सीखने के अवसर' सभी के लिए सुलभ, वहन योग्य और प्रासंगिक हों।

चर्चा में क्यों?

यूनेस्को (UNESCO) ने 24 जनवरी 2026 को 'अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस' के अवसर पर दुनिया का ध्यान एक गंभीर तथ्य की ओर आकर्षित किया है।

  • थीम: 2026 की थीम "शिक्षा के सह-निर्माण में युवाओं की शक्ति" रखी गई है।
  • प्रमुख मुद्दा: यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार, नामांकन बढ़ने के बावजूद दुनिया भर में लगभग 25 करोड़ बच्चे अभी भी औपचारिक शिक्षा से वंचित हैं। 2026 में चर्चा का मुख्य केंद्र 'स्कूलिंग विदाउट लर्निंग' (बिना सीख वाली स्कूली शिक्षा) बना हुआ है।

यह महत्वपूर्ण क्यों है?

शिक्षा वैश्विक स्थिरता की कुंजी है। यह केवल गरीबी उन्मूलन और आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य संकट और सामाजिक असमानता जैसे वैश्विक खतरों से लड़ने का सबसे प्रभावी हथियार है। 2026 की जटिल दुनिया में, एक शिक्षित और तकनीकी रूप से साक्षर पीढ़ी ही लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा कर सकती है।

सतत विकास लक्ष्य-4 और वैश्विक प्रगति समीक्षा

संयुक्त राष्ट्र की 2026 की प्रगति समीक्षा दर्शाती है कि 2030 तक सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने का लक्ष्य वर्तमान में संकट में है।

  • दक्षता में गिरावट: रिपोर्ट के अनुसार, निम्न और मध्यम आय वाले देशों में बुनियादी साक्षरता और गणितीय दक्षता के स्तर में चिंताजनक गिरावट आई है।
  • चुनौती: संघर्ष-ग्रस्त क्षेत्रों और शरणार्थी शिविरों में रहने वाले बच्चों के लिए शिक्षा अभी भी एक विलासिता बनी हुई है।

डिजिटल समानता: 2026 का मूल मंत्र

2026 में 'डिजिटल पहुंच' को एक मौलिक अधिकार के रूप में देखा जा रहा है।

  • सार्थक पहुंच:अब केवल कंप्यूटर देना पर्याप्त नहीं है; सार्थक पहुंच का अर्थ है उच्च गति इंटरनेट, स्थानीय भाषा में डिजिटल सामग्री और शिक्षकों का डिजिटल प्रशिक्षण।
  • डिजिटल न्याय: तकनीक तक सबकी समान पहुंच सुनिश्चित करना ही डिजिटल न्याय है, ताकि तकनीक अमीरों और गरीबों के बीच की खाई को और बढ़ा दे।

भारत में यूनिवर्सल एजुकेशन: NEP 2020 का 'आउटकम फेज'

भारत ने 2026 में 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020' के कार्यान्वयन के सबसे महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश किया है।

  • FLN मिशन: भारत का ध्यान अब 'निपुण भारत' (NIPUN Bharat) के माध्यम से बुनियादी साक्षरता सुनिश्चित करने पर है।
  • मूल्यांकन में बदलाव: रटने की प्रवृत्ति को खत्म कर अब 'योग्यता-आधारित मूल्यांकन' को अपनाया जा रहा है।
  • डिजिटल बुनियादी ढांचा: 'पीएम -विद्या' और 'दीक्षा 2.0' के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों तक शिक्षा पहुँचाई जा रही है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI):

2026 शिक्षा में AI के व्यापक एकीकरण का वर्ष है।

  • वरदान: AI के माध्यम से 'पर्सनलाइज्ड लर्निंग' (व्यक्तिगत शिक्षण) संभव हुआ है, जिससे हर छात्र अपनी गति से सीख सकता है।
  • चुनौती: डेटा गोपनीयता, एल्गोरिथम का पक्षपात और शिक्षकों की भूमिका का सीमित होना प्रमुख चिंताएँ हैं। बहस अब "AI बनाम शिक्षक" पर नहीं, बल्कि "शिक्षक के साथ AI" पर केंद्रित है।

शिक्षा वित्तपोषण की स्थिति

2026 में शिक्षा के लिए धन जुटाना एक बड़ी चुनौती है।

  • बजटीय कमी: यूनेस्को की चेतावनी के अनुसार, कई देश अभी भी अपनी जीडीपी का आवश्यक 4% से 6% हिस्सा शिक्षा पर खर्च नहीं कर रहे हैं।
  • नया मॉडल: भारत और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) और 'इम्पैक्ट बॉन्ड्स' के माध्यम से नवाचार के लिए धन जुटाया जा रहा है।

2026 का समग्र निष्कर्ष: तीन आधार स्तंभ

यूनिवर्सल एजुकेशन अब एक बहुआयामी अवधारणा है, जो इन तीन स्तंभों पर आधारित है:

  1. सीखने के परिणाम केवल उपस्थिति नहीं, बल्कि छात्र की वास्तविक दक्षता और कौशल।
  2. युवा सहभागिता:छात्रों और युवाओं को केवल 'उपभोक्ता' नहीं, बल्कि नीति-निर्माण में 'भागीदार' बनाना।
  3. डिजिटल न्याय: तकनीक का लोकतंत्रीकरण ताकि वह अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।

भारतीय संविधान में शिक्षा और न्याय संबंधी मुख्य प्रावधान

  • मौलिक अधिकार: अनुच्छेद 21A के तहत 6-14 वर्ष के बच्चों को 'नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा' का अधिकार प्राप्त है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत 'इंटरनेट तक पहुँच' के साथ जोड़कर आधुनिक शिक्षा के लिए अनिवार्य माना है।
  • समानता एवं न्याय: अनुच्छेद 14, 15 और 46 सुनिश्चित करते हैं कि शिक्षा में किसी भी स्तर पर भेदभाव हो और SC/ST अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक हितों को विशेष संरक्षण मिले।
  • अल्पसंख्यक एवं कर्तव्य: अनुच्छेद 29-30 अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थान चलाने की स्वतंत्रता देते हैं, जबकि 51A (k) के तहत बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करना माता-पिता का मूल कर्तव्य है।
  • प्रशासनिक ढांचा: शिक्षा 'समवर्ती सूची' का विषय है, जिस पर RTE अधिनियम, 2009 के माध्यम से केंद्र राज्य दोनों गुणवत्तापूर्ण और समावेशी शिक्षा (डिजिटल न्याय सहित) सुनिश्चित करने हेतु उत्तरदायी हैं।


विश्लेषण

गहन विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि 2026 की शिक्षा प्रणाली एक संक्रमण काल से गुजर रही है। जहाँ एक ओर तकनीक (AI, VR) शिक्षा को रोमांचक बना रही है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी सुविधाओं का अभाव और 'लर्निंग लॉस' (सीखने की हानि) अभी भी एक कड़वी सच्चाई है। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम तकनीक का उपयोग 'डिजिटल डिवाइड' को भरने के लिए करते हैं या इसे और गहरा होने देते हैं।

आगे की राह

  • हाइब्रिड मॉडल: पारंपरिक कक्षा शिक्षण और डिजिटल लर्निंग का सही संतुलन।
  • शिक्षक प्रशिक्षण: शिक्षकों को 'ज्ञान देने वाले' के बजाय 'सीखने के सुविधादाता' के रूप में प्रशिक्षित करना।
  • वैश्विक सहयोग: विकसित देशों को तकनीक और संसाधनों के हस्तांतरण के माध्यम से विकासशील देशों की मदद करनी चाहिए।

निष्कर्ष

2026 का यूनिवर्सल एजुकेशन नैरेटिव एक जागृति का आह्वान है। यह समय केवल स्कूल के निर्माण का नहीं, बल्कि 'सीखने के केंद्रों' के निर्माण का है। जब तक शिक्षा में 'डिजिटल न्याय' और 'सीखने की गुणवत्ता' सुनिश्चित नहीं होती, तब तक विकास का पहिया अधूरा रहेगा। भारत जैसे देशों के लिए, अपनी युवा आबादी का लाभ उठाने का यही एकमात्र मार्ग हैएक ऐसी शिक्षा व्यवस्था जो समावेशी, तकनीकी रूप से सक्षम और मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत हो।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

इतिहास गवाह है कि शक्ति और संसाधनों पर कब्जे की होड़ ने हमेशा दुनिया के नक्शे को बदला है। 18वीं और 19वीं सदी में 'साम्राज्यवाद' का दौर था, जहाँ ताकतवर देश कमजोर देशों पर सीधा सैन्य कब्जा करते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 'विमुक्ति' का दौर आया, लेकिन आज 21वीं सदी में वर्चस्व की लड़ाई ने नया रूप ले लिया है। आज युद्ध सिर्फ ज़मीन के लिए नहीं, बल्कि उन संसाधनों के लिए है जो भविष्य की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करेंगे। ग्रीनलैंड का मामला इसी बदलते परिप्रेक्ष्य का एक हिस्सा है।

नव-उपनिवेशवाद क्या है?

  • नव-उपनिवेशवाद का अर्थ है किसी देश पर सीधा सैन्य कब्जा किए बिना, आर्थिक दबाव, राजनीतिक प्रभाव या व्यापारिक संधियों के माध्यम से उस पर नियंत्रण बनाए रखना।
  • इसमें ताकतवर देश किसी कमजोर या विकासशील देश के संसाधनों का उपयोग अपने हित में करता है। यह 'सॉफ्ट पावर' और 'आर्थिक जाल' का आधुनिक रूप है।

चर्चा में क्यों?

डोनाल्ड ट्रम्प ने दावोस में एक बार फिर ग्रीनलैंड को "खरीदने" की इच्छा जताकर वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है।

  • पहला रुख: शुरुआत में इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्कटिक में सैन्य प्रभुत्व बढ़ाने के प्रयास के तौर पर देखा गया।
  • वर्तमान जिद: अब ट्रम्प इसे एक 'रियल एस्टेट' डील की तरह पेश कर रहे हैं। पहले जहाँ ताकत के बल पर प्रभाव जमाने की बात थी, अब पैसों के दम पर एक पूरे क्षेत्र की संप्रभुता खरीदने की जिद दिखाई दे रही है।

ट्रम्प वास्तव में इसे क्यों खरीदना चाहते हैं? (महत्ता)

ग्रीनलैंड की रणनीतिक और आर्थिक महत्ता अतुलनीय है:

  • खनिज संपदा: यहाँ 'रेयर अर्थ एलिमेंट्स' (दुर्लभ खनिज) का विशाल भंडार है, जो आधुनिक तकनीक और रक्षा उपकरणों के लिए अनिवार्य हैं।
  • उत्तरी समुद्री मार्ग (NSR): जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ पिघलने से यह नया व्यापारिक मार्ग खुल रहा है, जो एशिया और यूरोप के बीच की दूरी को कम करता है।
  • चीन को रोकना: चीन यहाँ निवेश बढ़ा रहा है। ट्रम्प इसे अमेरिका के "प्रभाव क्षेत्र" में अतिक्रमण मानते हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका के लिए महत्व

अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड एक 'स्ट्रेटेजिक बफर ज़ोन' है। रूस और चीन की आर्कटिक में बढ़ती गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण उसे एक निर्विवाद महाशक्ति के रूप में स्थापित करेगा। यह केवल रक्षा बल्कि भविष्य की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पर कब्जे की लड़ाई है।

यूरोप एवं नाटो पर प्रभाव और प्रतिक्रिया

यूरोपीय संघ (EU) और नाटो ने ट्रम्प के इस प्रस्ताव पर कड़ा रुख अपनाया है।

  • प्रतिक्रिया: डेनमार्क ने इसे स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए "हास्यास्पद" बताया है। नाटो के सदस्य देशों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है कि क्या उनका अपना सहयोगी उनकी क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करता है।
  • विश्लेषण: नाटो और ईयू के कड़े विरोध के कारण ट्रम्प का रुख युद्ध या सैन्य दबाव से हटकर "शांतिपूर्ण खरीद" की ओर बढ़ा है। लेकिन यह केवल एक रणनीतिक चुप्पी (Tactical Silence) हो सकती है। उनका मूल उद्देश्य संसाधनों पर नियंत्रण करना है, जो अंतरराष्ट्रीय नियमों को कमजोर करता है।

नव-उपनिवेशवाद के अन्य उदाहरण:

आज की कई वैश्विक घटनाओं को नव-उपनिवेशवाद के चश्मे से देखा जा सकता है:

  • रूस-यूक्रेन: क्षेत्रीय विस्तार और संसाधनों पर नियंत्रण का प्रयास।
  • अमेरिका-वेनेजुएला: तेल भंडारों पर राजनीतिक प्रभाव जमाने की कोशिश।
  • इजरायल-फिलिस्तीन: भूमि और संसाधनों का दीर्घकालिक संघर्ष।
  • ग्रीनलैंड: आर्थिक शक्ति के माध्यम से संप्रभुता का सौदा।

नव-उपनिवेशवाद के ऐतिहासिक एवं क्षेत्रीय उदाहरण

  • अफ्रीका में नव-उपनिवेशवाद: अफ्रीका नव-उपनिवेशवाद का सबसे बड़ा प्रयोगशाला रहा है। स्वतंत्रता मिलने के बाद भी कई अफ्रीकी देश आर्थिक रूप से बाहरी शक्तियों के गुलाम बने रहे:
  • फ्रांस और 'फ्रैंक': पश्चिम अफ्रीका के कई देशों की मुद्रा दशकों तक फ्रांस के नियंत्रण में रही। फ्रांस ने इन देशों के विदेशी मुद्रा भंडार पर कब्जा बनाए रखा, जिससे ये देश राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद आर्थिक रूप से पेरिस पर निर्भर रहे।
  • चीन का 'कर्ज जाल': वर्तमान में चीन अफ्रीका के बुनियादी ढांचे में भारी निवेश कर रहा है। जब देश कर्ज नहीं चुका पाते, तो चीन उनके रणनीतिक बंदरगाहों या खदानों पर नियंत्रण कर लेता है (जैसे जिबूती में सैन्य बेस)
  • लैटिन अमेरिका और 'बनाना रिपब्लिक': 20वीं सदी में अमेरिका ने लैटिन अमेरिका (जैसे ग्वाटेमाला, होंडुरास) में अपनी बड़ी कंपनियों (जैसे United Fruit Company) के हितों की रक्षा के लिए वहां की सरकारों को अस्थिर किया। इसे 'बनाना रिपब्लिक' कहा गया, जहाँ चुनी हुई सरकारें अमेरिकी व्यापारिक हितों की कठपुतली मात्र थीं।


  • दक्षिण-पूर्व एशिया (ऋण और संसाधन): श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह नव-उपनिवेशवाद का एक आधुनिक और डरावना उदाहरण है। कर्ज के बदले अपनी संप्रभुता का एक हिस्सा (बंदरगाह) 99 साल के लिए दूसरे देश (चीन) को सौंपना इसी श्रेणी में आता है।

नव-उपनिवेशवाद के प्रभाव

इसके परिणाम घातक हो सकते हैं। यह छोटे देशों की स्वायत्तता को खत्म करता है, स्थानीय समुदायों (जैसे ग्रीनलैंड के इनुइट लोग) के अधिकारों का हनन करता है और दुनिया को फिर से गुटबाजी और अस्थिरता की ओर धकेलता है।

भारत का पक्ष और दृष्टिकोण

भारत हमेशा से शांति, स्वतंत्रता और 'संप्रभु समानता' का पक्षधर रहा है।

  • द्वि-राष्ट्र सिद्धांत और शांति: भारत विवादों को बातचीत से सुलझाने और हर राष्ट्र की आजादी का सम्मान करने की नीति पर चलता है।
  • भारत का दृष्टिकोण: भारत ऐसी किसी भी गतिविधि का समर्थन नहीं करता जो किसी देश की संप्रभुता को पैसे या ताकत के दम पर चुनौती दे। भारत का मानना है कि वैश्विक संसाधनों पर सबका समान अधिकार होना चाहिए।

दूरगामी एवं तात्कालिक परिणाम

  • तात्कालिक: अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगियों (यूरोप) के बीच भरोसे की कमी और राजनयिक तनाव।
  • दूरगामी: यदि इस तरह के 'सौदे' सामान्य मान लिए गए, तो 'नियम-आधारित विश्व व्यवस्था' ढह जाएगी और दुनिया "जिसकी लाठी उसकी भैंस" के युग में लौट जाएगी।

विश्लेषण

पुराना साम्राज्यवाद शारीरिक गुलामी पर आधारित था, जबकि यह 'नया साम्राज्यवाद' आर्थिक और तकनीकी गुलामी पर आधारित है। आज डेटा, खनिज और समुद्री मार्गों पर कब्जा ही नया हथियार है। ट्रम्प की ग्रीनलैंड संबंधी जिद यह दर्शाती है कि लोकतांत्रिक मूल्यों के मुखौटे के पीछे आज भी महाशक्तियाँ संसाधनों के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

आगे की राह

  • अंतरराष्ट्रीय कानून: संयुक्त राष्ट्र को ऐसे प्रावधान मजबूत करने चाहिए जहाँ किसी देश की भूमि का "क्रय-विक्रय" संप्रभुता के विरुद्ध माना जाए।
  • स्थानीय संप्रभुता: ग्रीनलैंड के नागरिकों की इच्छा को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए।
  • सहयोगात्मक प्रबंधन: आर्कटिक के संसाधनों का उपयोग पर्यावरणीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए साझा वैश्विक हितों के लिए होना चाहिए।

निष्कर्ष

डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड को हासिल करने की कोशिश आधुनिक युग के 'संसाधन राष्ट्रवाद' और 'नव-उपनिवेशवाद' का एक स्पष्ट उदाहरण है। यह केवल एक भू-भाग की खरीद नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय गरिमा और संप्रभुता के सिद्धांतों की परीक्षा है। दुनिया को एक ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो विस्तारवाद के बजाय सह-अस्तित्व पर ध्यान दे। भारत जैसे देशों को एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का नेतृत्व करना चाहिए जहाँ ताकत या पैसा किसी देश की नियति तय करे।