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संदर्भ

भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय और औषधि महानियंत्रक (DCGI) ने मधुमेह और मोटापे के उपचार में वैश्विक स्तर पर प्रचलित GLP-1 दवाओं के अनियंत्रित प्रसार और स्वास्थ्य जोखिमों को देखते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण सुरक्षा नोट और चेतावनी जारी की है।

वर्तमान समाचार

हाल ही में नोवो नॉर्डिस्क जैसी कंपनियों द्वारा जेनेरिक प्रतिस्पर्धा के कारण अपनी दवाओं (Wegovy और Ozempic) की कीमतों में कमी करने के बाद, भारत में इनके दुरुपयोग की संभावना बढ़ गई है। इसके प्रत्युत्तर में सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं:

  • सख्त निरीक्षण: सरकार ने देश भर के 49 प्रमुख केंद्रों (ऑनलाइन फार्मेसी, थोक खुदरा विक्रेता और वेट लॉस क्लीनिक) का औचक निरीक्षण किया है और नियमों का उल्लंघन करने वालों को कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं।
  • अनधिकृत बिक्री पर रोक: DCGI ने स्पष्ट किया है कि ये दवाएं केवल पंजीकृत विशेषज्ञों (विशेषकर एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञ और हृदय रोग विशेषज्ञ) के प्रिस्क्रिप्शन पर ही बेची जा सकती हैं।
  • भ्रामक विज्ञापनों पर प्रहार: केंद्र ने उन सभी विज्ञापनों और प्रचारों पर प्रतिबंध लगा दिया है जो इन दवाओं को एक "सामान्य जीवनशैली उत्पाद" के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे। नियमों का उल्लंघन करने पर लाइसेंस रद्दीकरण और भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

GLP-1 दवाएं क्या हैं?

  • परिचय: GLP-1 (ग्लूकागॉन-लाइक पेप्टाइड-1) रिसेप्टर एगोनिस्ट शरीर में प्राकृतिक हार्मोन की नकल करते हैं। इसकी पहली दवा को वर्ष 2005 में अमेरिकी FDA द्वारा स्वीकृति दी गई थी।
  • कार्यप्रणाली: यह इंसुलिन स्राव को बढ़ाती है और ग्लूकागॉन के अत्यधिक स्राव को कम करती है।
    • यह रक्त शर्करा को नियंत्रित करने के साथ-साथ ये मस्तिष्क के भूख केंद्र को प्रभावित करती हैं और पेट खाली होने की गति को धीमा कर देती हैं, जिससे व्यक्ति को लंबे समय तक भूख नहीं लगती।
  • उपलब्ध दवाएं और रूप: ये दवाएं प्री-फिल्ड इंजेक्शन पेन (जैसे सेमाग्लूटाइड, लिराग्लूटाइड, टिर्जेपाटाइड) और ओरल टैबलेट (जैसे ओरल सेमाग्लूटाइड) के रूप में उपलब्ध हैं।
    • प्रमुख दवाओं में डुलाग्लूटाइड, एक्सेनाटाइड और एक्सेनाटाइड एक्सटेंडेड रिलीज भी शामिल हैं।

स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं और दुष्प्रभाव

सरकार ने चेतावनी दी है कि ये दवाएं "चिकित्सीय उपलब्धि" तो हैं, किंतु जोखिमों से मुक्त नहीं हैं:

  • गंभीर जटिलताएं: मुख्य रूप से अग्नाशयशोथ, गुर्दा क्षति और आंत्र अवरोध
  • कैंसर का जोखिम: शोधों में मेडुलरी थायरॉयड कैंसर के संभावित खतरों की ओर संकेत किया गया है।
  • अन्य लक्षण: निरंतर मतली, उल्टी, गंभीर चक्कर आना, थकान और पाचन तंत्र की जटिलताएं।
  • चेतावनी: बिना डॉक्टरी निगरानी के इनका उपयोग करना शरीर के हार्मोनल संतुलन को स्थायी रूप से बिगाड़ सकता है।
  • विशेष प्रतिबंध: गर्भवती महिलाओं और थायरॉयड की बीमारी वाले व्यक्तियों के लिए ये दवाएं अत्यंत घातक हो सकती हैं।

निष्कर्ष

यद्यपि GLP-1 दवाएं टाइप-2 मधुमेह और मोटापे के उपचार में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की एक अभूतपूर्व उपलब्धि हैं, किंतु इन्हें 'जीवनशैली उत्पाद' समझना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। सरकार के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, इन दवाओं का उपयोग केवल एंडोक्राइनोलॉजिस्ट या विशेषज्ञ चिकित्सकों के परामर्श और निरंतर निगरानी में ही किया जाना चाहिए। सुरक्षित और नियम-आधारित उपयोग ही इन दवाओं के लाभ सुनिश्चित कर सकता है।


संदर्भ

वैश्विक स्तर पर, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और युद्ध की परिस्थितियों को देखते हुए, भारत ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए उच्च-स्तरीय समीक्षा तेज कर दी है।

वर्तमान समाचार और बैठक का विवरण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के बीच भारत की तैयारियों और शमन रणनीतियों की समीक्षा के लिए सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति (CCS) की दूसरी विशेष बैठक की अध्यक्षता की।

  • बैठक का मुख्य केंद्र: इस बैठक में ईरान-इजरायल संघर्ष के संभावित प्रभाव, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली बाधाओं और कच्चे तेल उर्वरकों की उपलब्धता पर विस्तृत चर्चा की गई।
  • रणनीतिक निर्णय: सरकार ने नौवहन, विमानन और ऊर्जा क्षेत्र में संभावित चुनौतियों से निपटने के लिए आकस्मिक योजनाएं तैयार करने और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में स्थिरता बनाए रखने के निर्देश दिए हैं।

सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति (CCS)

  • परिचय: यह भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा व्यय और विदेश नीति से संबंधित मामलों पर निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था है।
  • अध्यक्षता: इसकी अध्यक्षता स्वयं प्रधानमंत्री करते हैं।
  • संरचना (प्रमुख सदस्य): इसमें प्रधानमंत्री के अतिरिक्त चार वरिष्ठतम मंत्री शामिल होते हैं:
    1. रक्षा मंत्री
    2. गृह मंत्री
    3. विदेश मंत्री
    4. वित्त मंत्री
  • प्रमुख कार्य:  राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील रणनीतिक मुद्दों पर निर्णय लेना।
    • सशस्त्र बलों के लिए बड़े रक्षा सौदों और पूंजीगत व्यय को मंजूरी देना।
    • आंतरिक सुरक्षा (आतंकवाद, उग्रवाद) और बाह्य खतरों के विरुद्ध नीति निर्धारण करना।
    • परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे रणनीतिक क्षेत्रों से संबंधित विषयों की समीक्षा करना।

निष्कर्ष

सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति भारत की रक्षा संरचना का वह केंद्रीय स्तंभ है जो संकट के समय त्वरित और समन्वित निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है। वर्तमान वैश्विक अस्थिरता के दौर में, CCS की यह सक्रियता केवल देश की सामरिक अखंडता बल्कि आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने में भी निर्णायक भूमिका निभाती है।

सामान्य अध्ययन पेपर – III:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

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प्रस्तावना

2 अप्रैल, 2026 की स्वर्णिम सुबह नासा (NASA) के आर्टेमिस II मिशन का सफल प्रक्षेपण मात्र एक वैज्ञानिक कीर्तिमान नहीं, अपितु अंतरिक्ष अन्वेषण के इतिहास में 'अपोलो युग' के पाँच दशकों बाद एक नए 'चंद्र-युग' का उद्घोष है। चार सदस्यीय चालक दल को चंद्रमा की कक्षा तक ले जाने वाला यह मिशन, मानव को पुनः चंद्र-सतह पर उतारने और वहां एक स्थायी चंद्र आधार स्थापित करने की दिशा में अब तक का सबसे निर्णायक और साहसिक कदम है।

अंतरिक्ष प्रतिस्पर्धा 2.0: द्वि-ध्रुवीय वैश्विक परिदृश्य

वर्तमान में अंतरिक्ष अन्वेषण का क्षेत्र दो प्रमुख रणनीतिक गुटों में विभाजित हो चुका है, जिसे 'न्यू स्पेस रेस' की संज्ञा दी जा सकती है:

  • आर्टेमिस अकॉर्ड्स (USA नेतृत्व): अमेरिका ने एक बहुपक्षीय ढांचा तैयार किया है जिसमें स्पेस-एक्स (SpaceX) और ब्लू ओरिजिन (Blue Origin) जैसी निजी दिग्गज कंपनियों के साथ भारत सहित 35 से अधिक मित्र राष्ट्र सहभागी हैं।
  • इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन (चीन-रूस नेतृत्व): चीन अपनी 'ILRS' योजना के माध्यम से एक स्वावलंबी और राज्य-नियंत्रित मॉडल पर कार्य कर रहा है, जो पश्चिमी प्रभुत्व को एक वैकल्पिक वैश्विक चुनौती प्रदान करता है।

मुख्य संघर्ष बिंदु: चंद्र संसाधन और सामरिक अधिकार

इस नवीन प्रतिस्पर्धा का केंद्र वैज्ञानिक जिज्ञासा के साथ-साथ आर्थिक लाभ भी है। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध 'जल-बर्फ' और 'ही़लियम-3' जैसे बहुमूल्य संसाधनों पर अधिकार प्राप्त करना दोनों शक्तियों का प्राथमिक लक्ष्य है।

  • महत्व: ये संसाधन केवल चंद्रमा पर जीवन की संभावनाओं के लिए अनिवार्य हैं, बल्कि भविष्य के मंगल अभियानों के लिए 'ईंधन पुनर्भरण केंद्र' के रूप में भी कार्य करेंगे।

भू-राजनीतिक प्रभाव और 'सिस-लूनर' प्रभुत्व

आज का अंतरिक्ष युग केवल अन्वेषण तक सीमित नहीं है। 'Cis-lunar space' (पृथ्वी और चंद्रमा के बीच का क्षेत्र) में रणनीतिक बढ़त हासिल करना अब राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और वैश्विक नेतृत्व का पैमाना बन गया है। अंतरिक्ष में प्रभाव का विस्तार अब आधुनिक 'मैकिंडर सिद्धांत' की भाँति वैश्विक भू-राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा का एक अपरिहार्य अंग बन चुका है।

भ्रांति बनाम वास्तविकता: आर्टेमिस II में भारत की स्थिति

अक्सर यह भ्रम होता है कि 'आर्टेमिस समझौते' का हिस्सा होने के कारण भारत इस मिशन में प्रत्यक्ष सहभागी है। वास्तविकता निम्नलिखित है:

  • मिशन की संरचना: आर्टेमिस II पूर्णतः नासा (NASA) और कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी (CSA) का संयुक्त उपक्रम है। इसमें चार अंतरिक्ष यात्री (3 अमेरिकी और 1 कनाडाई) शामिल हैं।
  • भारत की भूमिका: भारत प्रत्यक्ष रूप से इस मिशन के प्रक्षेपण या चालक दल का हिस्सा नहीं है। भारत की भागीदारी 'आर्टेमिस समझौते', 2023 के माध्यम से एक 'रणनीतिक साझेदार' की है, जो भविष्य के मिशनों के लिए सहयोग का मार्ग प्रशस्त करती है।
  • साझा उद्देश्य: यद्यपि भारत इस मिशन में शामिल नहीं है, किंतु इससे प्राप्त होने वाला वैज्ञानिक डेटा भारत के आगामी चंद्रयान-4 और लुपेक्स (LUPEX) मिशनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।

भारत की स्थिति: रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक सहभागिता

भारत इस वैश्विक परिदृश्य में एक संतुलित और स्वतंत्र ध्रुव के रूप में उभर रहा है:

  • आर्टेमिस समझौता (2023): भारत ने इस पर हस्ताक्षर कर अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण, पारदर्शी और नियम-आधारित उपयोग के प्रति अपनी वैश्विक प्रतिबद्धता दोहराई है।
  • रणनीतिक स्वायत्तता: आर्टेमिस समझौते का हिस्सा होते हुए भी भारत अपने 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (2035)' और 'मानव चंद्र लैंडिंग (2040)' के लक्ष्यों पर स्वतंत्र रूप से कार्य कर रहा है।
  • गगनयान और आत्मनिर्भरता: भारत अपने स्वदेशी 'गगनयान' मिशन के माध्यम से अपनी मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता का प्रदर्शन कर रहा है। 2040 तक चंद्रमा पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री भेजने का लक्ष्य भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' को परिभाषित करता है।
  • सहयोग के अवसर: भारत भविष्य में आर्टेमिस मिशनों के लिए उन्नत वैज्ञानिक पेलोड प्रदान करने और चंद्र गतिविधियों के सह-विकास में सक्रिय भागीदारी कर सकता है, जिससे इसरो (ISRO) को अत्याधुनिक तकनीक का लाभ मिलेगा।

आलोचनात्मक विश्लेषण: साझा विरासत बनाम संसाधन होड़

यहाँ एक गंभीर विधिक प्रश्न भी उत्पन्न होता है। यद्यपि 1967 की 'आउटर स्पेस ट्रीटी' खगोलीय पिंडों पर किसी भी देश की संप्रभुता का निषेध करती है, किंतु वर्तमान में जारी 'संसाधन निष्कर्षण' की होड़ इन अंतरराष्ट्रीय कानूनों की सीमाओं को चुनौती दे रही है। 'विजय' और 'पराजय' की यह प्रतिस्पर्धी भावना अंतरिक्ष के 'साझा विरासत' होने के मूल सिद्धांत के लिए संकट उत्पन्न कर सकती है।

आगे की राह:

वैश्विक समन्वय: अंतरिक्ष संसाधनों के न्यायसंगत और विवाद-मुक्त वितरण के लिए एक समावेशी अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे का निर्माण अनिवार्य है।

  • तकनीकी सुदृढ़ीकरण: भारत को अपने LVM3 प्रक्षेपण यान की वहन क्षमता बढ़ाने और चंद्रमा पर स्थायी रोबोटिक उपस्थिति सुनिश्चित करने पर निवेश बढ़ाना होगा।
  • निजी क्षेत्र का समावेशन: 'न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड' (NSIL) के माध्यम से भारतीय स्टार्टअप्स को चंद्र अर्थव्यवस्था के मुख्य प्रवाह में लाना होगा।

निष्कर्ष

आर्टेमिस II मिशन वैश्विक अंतरिक्ष बिरादरी के लिए एक 'प्रौद्योगिकी प्रदर्शकहै। भारत के लिए यह मिशन एक प्रेरणा और सीखने का अवसर है। भले ही भारत इस विशिष्ट मिशन का प्रत्यक्ष हिस्सा हो, किंतु इस दौरान विकसित होने वाली तकनीक और मानक भारत के अपने 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (2035)' और चंद्र मिशनों के लिए एक महत्वपूर्ण मानक स्थापित करेंगे।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध


संदर्भ

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात शीत युद्ध के दौरान वैश्विक शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत पर 'उत्तर अटलांटिक संधि संगठन' (NATO) की स्थापना की गई थी। हाल ही में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नाटो को "कागजी शेर" बताने और गठबंधन से बाहर निकलने की संभावना जताने के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मच गई है। यह विवाद मुख्य रूप से ईरान के साथ चल रहे सैन्य संघर्ष में नाटो सहयोगियों के असहयोग के कारण उपजा है।

नाटो (NATO)

  • क्या है?: यह एक अंतर-सरकारी सैन्य गठबंधन है, जो 'उत्तर अटलांटिक संधि' (जिसे वाशिंगटन संधि भी कहते हैं) पर आधारित है।
  • स्थापना: 4 अप्रैल, 1949 इसका मुख्यालय ब्रुसेल्स, बेल्जियम में है।
  • उद्देश्य: इसका मुख्य आधार अनुच्छेद 5 है, जो 'सामूहिक रक्षा' की बात करता है अर्थात किसी एक सदस्य देश पर हमला, सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा।
  • सदस्य संख्या: वर्तमान में इसके 32 सदस्य देश हैं।
  • नवीनतम सदस्य: फिनलैंड (2023) और स्वीडन (2024) इस गठबंधन के सबसे नए सदस्य बने हैं, जिन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद सुरक्षा कारणों से इसमें शामिल होने का निर्णय लिया।

चर्चा में क्यों?

  • ईरान संघर्ष पर असंतोष: राष्ट्रपति ट्रंप ने ब्रिटेन, फ्रांस और स्पेन जैसे सहयोगियों की आलोचना की है क्योंकि उन्होंने ईरान के विरुद्ध सैन्य अभियानों में शामिल होने और 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' को खुलवाने में अमेरिका का साथ नहीं दिया।
  • गठबंधन से निकास की धमकी: ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सहयोगी देश " खुद के लिए लड़ना सीखना शुरू कर दें, क्योंकि अमेरिका अब आपकी मदद के लिए वहाँ नहीं होगा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वह नाटो से बाहर निकलने पर विचार कर रहे हैं।
  • आपातकालीन बैठक: इसी गतिरोध को सुलझाने के लिए नाटो महासचिव मार्क रुटे अगले सप्ताह (8 अप्रैल, 2026) राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिकी रक्षा अधिकारियों से मिलने वाशिंगटन जा रहे हैं।

प्रासंगिकता

यह केवल एक सैन्य गठबंधन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था के ढहने का संकेत है। यदि दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति (अमेरिका) नाटो से बाहर निकलती है, तो यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो सकती है और रूस चीन जैसे देशों का प्रभाव तेजी से बढ़ सकता है।

नाटो की प्रासंगिकता और प्रभाव

  • नाटो सदस्यों पर प्रभाव: यूरोपीय देशों को अपनी रक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम करनी होगी और अपने सैन्य बजट में भारी वृद्धि करनी होगी। सुरक्षा की गारंटी खत्म होने से बाल्टिक देशों (जैसे एस्टोनिया, लातविया) में भय का माहौल बनेगा।
  • भारत पर प्रभाव:
    • ऊर्जा सुरक्षा: स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के बंद होने से भारत की तेल आपूर्ति प्रभावित होगी। नाटो में फूट से इस संकट का समाधान और जटिल हो जाएगा।
    • रणनीतिक संतुलन: अमेरिका का ध्यान यूरोप से हटकर पूरी तरह पश्चिम एशिया (ईरान) पर केंद्रित होने से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है।
    • हथियार और तकनीक: भारत के लिए पश्चिमी देशों के साथ रक्षा सहयोग के नए समीकरण बन सकते हैं।

नाटो (NATO) से बाहर निकलने की प्रक्रिया

उत्तर अटलांटिक संधि (1949) के अनुच्छेद 13 के अनुसार, कोई भी सदस्य देश 20 वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद (जो कि अब प्रभावी है) अमेरिकी सरकार को सूचना देकर एक वर्ष के नोटिस पर सदस्यता समाप्त कर सकता है। हालांकि, अमेरिका में NDAA कानून के तहत राष्ट्रपति अकेले यह निर्णय नहीं ले सकते; इसके लिए सीनेट की दो-तिहाई मंजूरी या कांग्रेस का अधिनियम अनिवार्य है। निकास के बाद संबंधित देश अनुच्छेद 5 (सामूहिक रक्षा) के सुरक्षा कवच और साझा सैन्य कमान खुफिया जानकारियों से पूरी तरह बाहर हो जाता है। ऐतिहासिक रूप से अब तक किसी ने नाटो नहीं छोड़ा है, किंतु फ्रांस (1966) सैन्य कमान से अलग हुआ था और 2009 में पुनः शामिल हुआ।

विश्लेषण

ट्रंप का "कागजी शेर" वाला बयान नाटो की उस कमजोरी को दर्शाता है जहाँ सदस्य देश आर्थिक लाभ तो चाहते हैं, लेकिन सैन्य जोखिम साझा करने में संकोच करते हैं। नाटो ऐतिहासिक रूप से सोवियत संघ (रूस) के विरुद्ध बना था, लेकिन आज की वैश्विक चुनौतियां (ईरान, साइबर युद्ध, चीन) अलग हैं। अमेरिका का यह रुख 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का चरम रूप है, जहाँ वह अब बिना किसी ठोस लाभ के 'दुनिया का पुलिसकर्मी' बनने को तैयार नहीं है।

आगे की राह

  • उत्तरदायित्व का साझाकरण: यूरोपीय देशों को नाटो के भीतर अपने वित्तीय और सैन्य योगदान को बढ़ाना होगा।
  • संधि का आधुनिकीकरण: नाटो को केवल रूस तक सीमित रहकर वैश्विक जलमार्गों की सुरक्षा और आतंकवाद जैसे नए खतरों पर एक साझा नीति बनानी चाहिए।
  • राजनयिक समाधान: मार्क रुटे और ट्रंप की आगामी बैठक में एक 'मध्यम मार्ग' की तलाश आवश्यक है ताकि दशकों पुराना यह गठबंधन टूटने से बच सके।

निष्कर्ष

नाटो वर्तमान में अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। अमेरिका के बिना नाटो का कोई सैन्य महत्व शेष नहीं रह जाएगा। हालांकि, ट्रंप की धमकियाँ सहयोगियों पर दबाव बनाने की एक रणनीति भी हो सकती हैं। एक स्थिर वैश्विक व्यवस्था के लिए यह अनिवार्य है कि लोकतांत्रिक राष्ट्र सुरक्षा हितों पर एकमत हों, अन्यथा सत्ता के शून्य का लाभ अराजक शक्तियां उठाएंगी।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

भारतीय लोकतंत्र में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए 'भारत निर्वाचन आयोग' (ECI) को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। हाल ही में 2026 के विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही आयोग द्वारा प्रशासनिक फेरबदल की शक्ति का प्रयोग चर्चा और विवाद का केंद्र बन गया है।

वरिष्ठ अधिकारियों का स्थानांतरण एवं संवैधानिक आधार

चुनाव आचार संहिता लागू होते ही, निर्वाचन आयोग उन अधिकारियों के स्थानांतरण का आदेश देता है जो चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। संविधान का अनुच्छेद 324 आयोग को चुनावों के 'अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण' की शक्ति प्रदान करता है, जिसका उपयोग वह निष्पक्षता बनाए रखने के लिए करता है।

चर्चा में क्यों?

वर्ष 2026 के चुनाव कार्यक्रम (असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी) की घोषणा के साथ ही निम्नलिखित घटनाक्रम सामने आए हैं:

  • रातों-रात स्थानांतरण: पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) जैसे शीर्ष पदों पर आसीन अधिकारियों का बिना राज्य सरकार की पूर्व सहमति के स्थानांतरण कर दिया गया।
  • प्रशासनिक शिथिलता: अचानक किए गए इन बड़े बदलावों से राज्य प्रशासन की कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
  • विवाद का केंद्र: यह प्रश्न खड़ा हो गया है कि क्या मुट्ठी भर शीर्ष अधिकारियों को हटाए बिना निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं, और क्या यह कदम राज्य की स्वायत्तता का उल्लंघन है।

संवैधानिक प्रावधान: निर्वाचन और स्थानांतरण

  • अनुच्छेद 324: यह आयोग को चुनाव संपन्न कराने हेतु सर्वोपरि शक्ति देता है। इसमें यह भी प्रावधान है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल, आयोग के अनुरोध पर, उसे आवश्यक कर्मचारी उपलब्ध कराएंगे।
  • प्रतिनिधित्व (जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951): इस अधिनियम की धारा 28A के अनुसार, चुनाव के दौरान प्रतिनियुक्ति पर तैनात अधिकारी निर्वाचन आयोग के नियंत्रण और अनुशासन के अधीन माने जाते हैं।

उच्चतम न्यायालय के स्पष्टीकरण

उच्चतम न्यायालय ने समय-समय पर स्पष्ट किया है कि:

  • शक्तियाँ असीमित नहीं हैं: 'मोहिंदर सिंह गिल' वाद में न्यायालय ने कहा था कि अनुच्छेद 324 आयोग को असीमित या निरंकुश शक्तियाँ नहीं देता; उसे स्थापित कानूनों के दायरे में ही कार्य करना चाहिए।
  • तर्कसंगतता: स्थानांतरण के आदेश मनमाने नहीं होने चाहिए, बल्कि उनके पीछे ठोस प्रशासनिक कारण होने चाहिए।

महत्व और इन घटनाओं के प्रभाव

  • महत्व: यह आयोग की उस शक्ति को दर्शाता है जिसके माध्यम से वह राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करने का प्रयास करता है।
  • नकारात्मक प्रभाव: शीर्ष अधिकारियों (मुख्य सचिव/DGP) का अचानक हटना 'प्रशासनिक पक्षाघात' जैसी स्थिति उत्पन्न कर सकता है, जिससे राज्य की कानून-व्यवस्था और सामान्य जनजीवन प्रभावित होता है।

लोकतंत्र और निर्वाचन आयोग के निर्णयों का विश्लेषण

लोकतंत्र में शक्तियों का पृथक्करण अनिवार्य है।

  • कार्यपालिका बनाम आयोग: राज्य सरकार की सहमति के बिना शीर्ष अधिकारियों का स्थानांतरण संघीय ढांचे के सिद्धांतों को चुनौती देता है।
  • संस्थागत विश्वसनीयता: यदि आयोग के निर्णय केवल 'उग्रता' पर आधारित दिखते हैं, तो इसकी निष्पक्ष छवि पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।

विश्लेषण

आयोग की शक्ति और जवाबदेही के बीच एक महीन रेखा है। जहाँ निष्पक्ष चुनाव के लिए प्रशासनिक शुद्धिकरण आवश्यक है, वहीं यह भी विचारणीय है कि क्या केवल अधिकारियों को बदलने से चुनावी शुचिता सुनिश्चित हो जाती है? प्रशासनिक प्रमुखों का रातों-रात हटाया जाना राज्य की चुनी हुई सरकार की गरिमा और संवैधानिक अधिकारों के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न करता है।

आगे की राह

  • परामर्श प्रक्रिया: भविष्य में विवादों को कम करने के लिए आयोग और राज्य सरकार के बीच एक न्यूनतम परामर्श प्रक्रिया होनी चाहिए।
  • कारणों की पारदर्शिता: स्थानांतरण आदेशों के पीछे के ठोस कारणों को (जहाँ संभव हो) सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
  • संस्थागत सुधार: राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच समन्वय के माध्यम से एक ऐसा तंत्र विकसित हो, जहाँ चुनाव के समय प्रशासनिक फेरबदल सुचारू रूप से हो सके।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः, भारत निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ लोकतंत्र की रक्षा के लिए हैं, कि प्रशासनिक अस्थिरता उत्पन्न करने के लिए। अनुच्छेद 324 के तहत प्राप्त शक्तियों का प्रयोग अत्यंत संयम और तर्कसंगत आधार पर किया जाना चाहिए। एक जीवंत लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि आयोग की स्वतंत्रता और राज्यों की प्रशासनिक स्वायत्तता के बीच एक स्वस्थ संतुलन बना रहे।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

संदर्भ

भारतीय संविधान में राज्यपाल को राज्य का संवैधानिक प्रमुख माना गया है, किंतु वास्तविक कार्यपालिका शक्तियाँ मंत्रिपरिषद के पास होती हैं। संविधान के अंतर्गत राज्यपाल कुछ विशेष परिस्थितियों में दया, क्षमा, दंड में कमी अथवा समयपूर्व रिहाई जैसे अधिकारों का प्रयोग करते हैं। हाल ही में इस विषय पर न्यायिक व्याख्या ने यह स्पष्ट किया है कि राज्यपाल इन शक्तियों का प्रयोग स्वतंत्र रूप से नहीं कर सकते, बल्कि उन्हें मंत्रिपरिषद की सलाह का पालन करना अनिवार्य है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 161

अनुच्छेद 161 राज्यपाल को क्षमादान की शक्ति प्रदान करता है। इसके तहत राज्यपाल को किसी भी ऐसे मामले से संबंधित कानून के विरुद्ध अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा को क्षमा, विलंबन, अल्पविराम करने या सजा को निलंबित, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है। यह शक्ति अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को प्राप्त शक्तियों के समान है, हालांकि इसका कार्यक्षेत्र राज्य के कानूनों तक सीमित है।

चर्चा में क्यों?

मद्रास उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ (न्यायमूर्ति .डी. जगदीश चंदिरा, जी.के. इलंथिरैयन और सुंदर मोहन) ने 2 अप्रैल, 2026 को एक महत्वपूर्ण संदर्भ का उत्तर देते हुए स्पष्ट किया है कि:

  • अनिवार्य सलाह: राज्यपाल, संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत दोषियों की सजा में छूट और समयपूर्व रिहाई के मामलों में मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य हैं।
  • स्वतंत्र विवेक का अभाव: पीठ ने कड़े शब्दों में कहा कि राज्यपाल इस विषय पर अपनी पसंद या नापसंद के आधार पर कोई स्वतंत्र विवेक प्रयोग नहीं कर सकते।
  • न्यायिक स्पष्टता: यह निर्णय एक डिवीजन बेंच द्वारा भेजे गए कानूनी प्रश्न के उत्तर में आया, जिससे अब राज्यपाल की शक्तियों पर लगा संशय समाप्त हो गया है।

राज्यपाल और उनकी शक्तियाँ

संविधान राज्यपाल को व्यापक शक्तियाँ देता है, जिन्हें मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

  • कार्यकारी शक्तियाँ: राज्य के सभी प्रशासनिक कार्य राज्यपाल के नाम से किए जाते हैं।
  • विधायी शक्तियाँ: सत्र बुलाना और विधेयकों पर सहमति देना।
  • क्षमादान शक्तियाँ (अनुच्छेद 161): इसी शक्ति की व्याख्या वर्तमान निर्णय का मुख्य केंद्र है।

मंत्रिपरिषद की सलाह: संवैधानिक प्रावधान

अनुच्छेद 163 स्पष्ट करता है कि राज्यपाल को उनके कार्यों के निष्पादन में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रमुख मुख्यमंत्री होगा। संविधान के मूल ढांचे के अनुसार, जहाँ संविधान राज्यपाल को स्पष्ट रूप से 'स्वविवेक' का अधिकार नहीं देता, वहाँ उन्हें मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही कार्य करना होता है। न्यायालय ने पुन: पुष्टि की है कि अनुच्छेद 161 'स्वविवेक' के अंतर्गत नहीं आता जब तक संविधान स्पष्ट रूप से विवेक दे

मूल संविधान की स्थिति

मूल संविधान के अनुच्छेद 163(1) में लिखा गया था कि "जिन बातों में इस संविधान द्वारा या इसके अधीन राज्यपाल से यह अपेक्षित है कि वह अपने कार्यों को अपने विवेक से करे, उन बातों को छोड़कर राज्यपाल को अपने कार्यों का निर्वहन करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान, मुख्यमंत्री होगा।"

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि मूल संविधान में राज्यपाल को 'स्वविवेक' की शक्ति दी गई थी, जो राष्ट्रपति (अनुच्छेद 74) को नहीं दी गई थी। इसी कारण लंबे समय तक यह भ्रम रहा कि राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य हैं या नहीं।

42वां संशोधन (1976) और अंतर

  • राष्ट्रपति के लिए: 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा अनुच्छेद 74(1) में स्पष्ट रूप से यह जोड़ दिया गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही कार्य करेंगे और वह उनके लिए बाध्यकारी होगी।
  • राज्यपाल के लिए: आश्चर्यजनक रूप से, अनुच्छेद 163 में ऐसा कोई संशोधन नहीं किया गया। आज भी अनुच्छेद 163 की शब्दावली वही है जो 1950 में थी। इसमें 'बाध्यकारी' शब्द का स्पष्ट प्रयोग नहीं है।

न्यायिक व्याख्या

चूँकि संविधान में संशोधन नहीं हुआ, इसलिए यह जिम्मेदारी न्यायपालिका पर गई। उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से स्पष्ट किया कि भले ही अनुच्छेद 163 में 'बाध्यकारी' शब्द लिखा हो, लेकिन संसदीय शासन प्रणाली का अर्थ ही यही है कि संवैधानिक प्रमुख सलाह से बंधा हुआ है।

पुराने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय

न्यायालय ने अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के पिछले निर्णयों का भी सहारा लिया:

  • नबाम रेबिया मामला (2016): सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि राज्यपाल का स्वविवेक बहुत सीमित है और वह मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना या उसके विरुद्ध कार्य नहीं कर सकते।
  • मारू राम बनाम भारत संघ (1980): इसमें स्पष्ट किया गया था कि अनुच्छेद 72 और 161 के तहत शक्ति का प्रयोग वास्तव में सरकार (मंत्रिपरिषद) द्वारा किया जाता है, कि व्यक्तिगत रूप से राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा।
  • शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974): न्यायालय ने निर्धारित किया था कि राज्यपाल केवल उन्हीं मामलों में विवेक का उपयोग कर सकते हैं जहाँ संविधान उन्हें स्पष्ट रूप से ऐसा करने की अनुमति देता है।

संघीय प्रावधानों की प्रासंगिकता और प्रभाव

यह निर्णय भारतीय संविधान के संघीय ढांचे को मजबूती प्रदान करता है।

  • चुनी हुई सरकार का सम्मान: यह स्पष्ट करता है कि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी गई मंत्रिपरिषद की इच्छा ही सर्वोपरि है।
  • संवैधानिक गतिरोध का समाधान: अक्सर देखा गया है कि राज्यपाल फाइलों को अनिश्चित काल तक रोक कर रखते हैं। इस निर्णय से ऐसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगेगा।
  • शक्ति का संतुलन: यह सुनिश्चित करता है कि संवैधानिक प्रमुख 'समानांतर सरकार' चलाएं।

आगे की राह:

  • समय सीमा का निर्धारण: भविष्य में ऐसे विवादों से बचने के लिए यह आवश्यक है कि राज्यपाल द्वारा फाइलों पर निर्णय लेने हेतु एक निश्चित समय सीमा (Timeframe) तय की जाए, ताकि न्याय में विलंब हो।
  • सहकारी संघवाद: राजभवनों और राज्य सरकारों के बीच संवैधानिक सद्भाव बनाए रखने के लिए सरकारिया आयोग और पुंछी आयोग की सिफारिशों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए।
  • संस्थागत स्पष्टता: इस प्रकार के न्यायिक स्पष्टीकरणों को प्रशासनिक प्रशिक्षण का हिस्सा बनाया जाना चाहिए ताकि संवैधानिक पदाधिकारियों के मध्य अधिकारों को लेकर कोई अस्पष्टता शेष रहे।

विश्लेषण

मद्रास उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय संवैधानिक तंत्र में 'विधि के शासन' और 'संसदीय लोकतंत्र' के बीच संतुलन को रेखांकित करता है। इसका विश्लेषण निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से किया जा सकता है:

  • संवैधानिक मर्यादा: संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत दी गई शक्तियाँ राज्यपाल की 'निजी प्रसन्नता' पर आधारित नहीं हैं, बल्कि ये सार्वजनिक कर्तव्य का हिस्सा हैं। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि 'संवैधानिक प्रमुख' और 'वास्तविक कार्यपालिका' के बीच किसी भी द्वंद्व की स्थिति में, चुनी हुई सरकार की सलाह ही सर्वोपरि होगी।
  • विवेक बनाम बाध्यता: यद्यपि राज्यपाल को कुछ विशेष परिस्थितियों में स्वविवेकीय शक्तियाँ प्राप्त हैं, किंतु क्षमादान और सजा का लघुकरण जैसे विषय इस श्रेणी में नहीं आते। यदि राज्यपाल को इन मामलों में स्वतंत्र निर्णय की अनुमति दी जाती, तो यह अनुच्छेद 163 की मूल भावना और संसदीय उत्तरदायित्व के सिद्धांत का उल्लंघन होता।
  • संघीय संतुलन: यह निर्णय राज्यपाल के पद के राजनीतिकरण को रोकने की दिशा में एक प्रभावी कदम है। यह सुनिश्चित करता है कि राज्य का संवैधानिक प्रमुख केंद्र और राज्य के बीच एक सेतु के रूप में कार्य करे, कि राज्य की कार्यकारी शक्तियों के मार्ग में एक अवरोधक के रूप में।

निष्कर्ष

भारतीय मूल संविधान में राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करना था, लेकिन इसे "अनिवार्य बाध्यता" के रूप में किसी संशोधन द्वारा नहीं, बल्कि न्यायालय की व्याख्याओं द्वारा स्थापित किया गया है। यही कारण है कि मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने हालिया निर्णय में उन्हीं पुराने न्यायिक सिद्धांतों को दोहराया है, क्योंकि संविधान की पाठ्य-पुस्तकीय भाषा में राज्यपाल को राष्ट्रपति की तुलना में अधिक 'विवेकाधीन शक्तियाँ' प्रतीत होती हैं, जिसे न्यायालय ने समय-समय पर सीमित किया है। यह निर्णय संवैधानिक नैतिकता और उत्तरदायी शासनके सिद्धांत को सुदृढ़ करता है।