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सामान्य अध्ययन पेपर–III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
भारत अपनी नेविगेशन प्रणाली NavIC (भारतीय नक्षत्र आधारित नौवहन प्रणाली) को वैश्विक मानकों के अनुरूप उन्नत करने के लिए 'NVS' श्रृंखला के उपग्रहों का प्रक्षेपण कर रहा है। NVS-02 इस श्रृंखला का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मिशन था, जो भारत की सामरिक और नागरिक नेविगेशन क्षमताओं को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया था।
NVS-02 मिशन: NVS-02 दूसरी पीढ़ी का पहला प्रमुख नेविगेशन उपग्रह था।
- प्रक्षेपण तिथि: 29 जनवरी, 2025।
- प्रक्षेपण यान: GSLV (भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान)।
- भार: लगभग 2,232 किलोग्राम।
- कक्षा (ऑर्बिट): इसे 'जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट' (GTO) में स्थापित किया जाना था, जहाँ से इसे अपनी अंतिम भू-स्थैतिक कक्षा में पहुँचना था।
NVS-02 की तकनीकी विशेषताएँ: इस मिशन में कई ऐसी तकनीकें थीं जो इसे पहली पीढ़ी से अलग बनाती थीं:
- स्वदेशी रूबिडियम परमाणु घड़ी: इसमें भारत में विकसित परमाणु घड़ी का उपयोग किया गया था, जो सटीक समय की गणना के लिए अनिवार्य है।
- L1 बैंड सिग्नल: पहली बार इसमें L1 बैंड सिग्नल शामिल किया गया था, जो नागरिक उपयोग और स्मार्टफोन में नेविगेशन को आसान बनाने के लिए वैश्विक स्तर पर मानक है।
- दीर्घायु: इस उपग्रह का जीवनकाल 12 वर्ष से अधिक निर्धारित किया गया था।
चर्चा में क्यों:
- यह विषय वर्तमान में चर्चा का केंद्र इसलिए है क्योंकि इसरो ने मिशन की विफलता के लगभग एक वर्ष पश्चात इस पर अपनी चुप्पी तोड़ी है।
- संस्थान ने एक तकनीकी समिति की रिपोर्ट और प्रेस वक्तव्य जारी किया है, जो NVS-02 के अपनी निर्धारित कक्षा प्राप्त न कर पाने के कारणों का विश्लेषण करता है।
- यह विलंबित प्रकटीकरण संस्थान की 'अपारदर्शिता' पर उठ रहे सवालों के बीच 'सार्वजनिक विश्वास' को पुनः प्राप्त करने का एक प्रयास माना जा रहा है।
NVS-02 मिशन की विफलता के सूक्ष्म कारण: तकनीकी समिति ने विफलता के लिए 'इंजन कंट्रोल सिस्टम' में खराबी को उत्तरदायी ठहराया है:
- सिग्नल का अवरोध: इंजन की 'ऑक्सीडाइज़र लाइन' में स्थित एक महत्वपूर्ण वाल्व को सक्रिय करने के लिए भेजा गया विद्युत संकेत अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच सका। सिग्नल न मिलने के कारण इंजन 'बर्न' नहीं कर पाया। जिससे उपग्रह अपनी इच्छित ऊँचाई प्राप्त नहीं कर सका और अंततः मिशन विफल रहा।
- कनेक्शन विसंगति: प्राथमिक और बैकअप दोनों विद्युत प्रणालियों में कम से कम एक कनेक्शन के ढीले होने या विफल होने के कारण यह तकनीकी गतिरोध उत्पन्न हुआ।
- इंजन प्रज्वलन में विफलता: इस वाल्व के सक्रिय न होने के कारण इंजन 'फायरिंग' नहीं कर सका, जो अंतरिक्ष यान की कक्षा को ऊपर उठाने के लिए अनिवार्य था।
- ऑक्सीडाइज़र लाइन वाल्व: रॉकेट के ऊपरी चरण में इंजन को प्रज्वलित करने के लिए ऑक्सीडाइज़र की आपूर्ति करने वाला वाल्व नहीं खुल सका।
- प्रणालीगत विफलता: सिग्नल न मिलने के कारण इंजन 'बर्न' (Burn) नहीं कर पाया, जिससे उपग्रह अपनी इच्छित ऊँचाई प्राप्त नहीं कर सका और अंततः मिशन विफल रहा।
चिंता का विषय: पारदर्शिता बनाम अपारदर्शिता:
- सूचना का अभाव: इसरो ने यह स्पष्ट नहीं किया कि कनेक्शन ढीला होने का कारण खराब गुणवत्ता थी या डिज़ाइन में कोई मूलभूत कमी।
- वैज्ञानिक जवाबदेही: विफलता विश्लेषण को सार्वजनिक न करना भविष्य के अनुसंधान और निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए बाधक बन सकता है।
सार्वजनिक विश्वास पर प्रभाव:
- इसरो की विश्वसनीयता इसकी पारदर्शिता पर निर्भर करती है। जनता और करदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि उच्च-बजट वाले राष्ट्रीय मिशनों में विफलता का सटीक कारण क्या था ताकि भविष्य में जिम्मेदारी तय की जा सके।
अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य और प्रतिस्पर्धा:
- NavIC सीधे तौर पर अमेरिका के GPS, रूस के GLONASS और चीन के BeiDou के साथ प्रतिस्पर्धा करता है। NVS-02 की विफलता और उसके बाद की अपारदर्शिता भारत की इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खड़े होने की क्षमता पर कूटनीतिक सवाल उठाती है।
सरकारी पहल और सुधारात्मक विश्लेषण:
- सरकार ने 'इन-स्पेस' (IN-SPACe) जैसी संस्थाओं के माध्यम से अंतरिक्ष क्षेत्र को खोला है। ऐसे में इसरो को अपनी 'विफलता विश्लेषण' पद्धति को और अधिक पेशेवर और सार्वजनिक बनाना होगा ताकि निजी निवेशकों का भरोसा बना रहे।
सीख और आगामी मिशनों पर प्रभाव:
- इस विफलता का लाभ LVM3-M5 मिशन (2 नवंबर, 2025) में देखा गया। GSAT-20 के सफल प्रक्षेपण ने यह सिद्ध किया कि इसरो ने NVS-02 की विद्युत प्रणालियों और वाल्व मैकेनिज्म की खामियों को पहचान कर उन्हें दुरुस्त कर लिया है।
भावी मार्ग:
- डिजिटल पारदर्शिता: विफलता की जांच के लिए एक स्वतंत्र डेटा पोर्टल बनाया जाना चाहिए।
- मानक संचालन प्रक्रिया (SOP): विनिर्माण के दौरान विद्युत कनेक्शनों की 'मल्टी-लेवल' चेकिंग और वाइब्रेशन टेस्ट को अधिक कठोर बनाया जाए।
निष्कर्ष:
NVS-02 मिशन भले ही तकनीकी रूप से विफल रहा, किंतु इसने इसरो को अपनी प्रक्रियाओं के आत्मनिरीक्षण का अवसर दिया है। भारत को एक 'ग्लोबल स्पेस हब' बनाने के लिए तकनीकी श्रेष्ठता के साथ-साथ प्रशासनिक पारदर्शिता को भी प्राथमिकता देनी होगी।