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सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन


संदर्भ

ऊर्जा सुरक्षा किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता और आर्थिक प्रगति का आधार स्तंभ होती है। भारत की बढ़ती जनसंख्या और औद्योगिक विस्तार के बीच, परमाणु ऊर्जा एक ऐसे स्वच्छ एवं विश्वसनीय विकल्प के रूप में उभरी है जो विकास और पर्यावरण संरक्षण के मध्य संतुलन स्थापित करने में सक्षम है।

परमाणु ऊर्जा:

परमाणु ऊर्जा, परमाणु के नाभिक के विखंडन से उत्पन्न होने वाली वह शक्ति है, जो न्यूनतम ईंधन में विशाल ऊर्जा प्रदान करती है। यह 'बेसलोड' बिजली का एक प्रमुख स्रोत है, जो सौर और पवन ऊर्जा की तरह रुक-रुक कर नहीं, बल्कि निरंतर विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करती है।

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन के विश्लेषण और 'शांति अधिनियम 2025' के प्रस्ताव ने परमाणु क्षेत्र में निजी निवेश के द्वार खोल दिए हैं।
  • भारत द्वारा अपनी परमाणु क्षमता को 2047 तक 100 GW तक पहुँचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य इस विषय को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ले आया है।

भारत को परमाणु ऊर्जा की आवश्यकता क्यों?

भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग और वैश्विक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए परमाणु ऊर्जा अपरिहार्य है:

  • विकसित भारत @2047: भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए प्रति व्यक्ति बिजली खपत में भारी वृद्धि आवश्यक है।
  • नेट-जीरो लक्ष्य 2070: जीवाश्म ईंधन (कोयला) पर निर्भरता कम कर शून्य उत्सर्जन की प्राप्ति के लिए परमाणु ऊर्जा एकमात्र स्थायी विकल्प है।
  • वैश्विक तुलना और मांग (सांख्यिकी):
    • भारत की प्रति व्यक्ति खपत: वर्तमान में मात्र 1,418 kWh है।
    • चीन: 7,097 kWh
    • संयुक्त राज्य अमेरिका: 12,701 kWh
    • भारत की स्थिति: वैश्विक औसत का केवल 1/5 हिस्सा।
  • वर्तमान उत्पादन स्थिति: जून 2025 तक भारत की कुल क्षमता 476 GW है, जिसमें थर्मल पावर का हिस्सा 75% है, जबकि परमाणु ऊर्जा केवल 3% (8.8 GW) का योगदान दे रही है।

भारत का त्रि-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम

डॉ. होमी जहांगीर भाभा द्वारा परिकल्पित यह कार्यक्रम भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की कुंजी है:

  • प्रथम चरण: प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर्स (PHWRs) - प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग।
  • द्वितीय चरण: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स (FBR) - प्लूटोनियम का उपयोग (जैसे कलपक्कम में PFBR)
  • तृतीय चरण: थोरियम आधारित रिएक्टर्स - भारत के विशाल थोरियम भंडार का उपयोग कर दीर्घकालिक सुरक्षा।

भारत की परमाणु ऊर्जा यात्रा

स्वदेशी तकनीक के विकास से लेकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग तक, भारत ने लंबी दूरी तय की है। आज भारत ने 220 MW, 540 MW और 700 MW के स्वदेशी रिएक्टर विकसित किए हैं, जिनकी लागत वैश्विक स्तर पर सबसे किफायती मानी जाती है। अब भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, जो कम पूंजी और कम समय में तैयार किए जा सकते हैं।

सरकारी पहल: शांति (SHANTI) योजना एवं अन्य

सरकार ने इस क्षेत्र को आधुनिक बनाने के लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाए हैं:

  • शांति योजना (2025): यह अधिनियम निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित करता है और विनियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाता है।
  • विदेशी निवेश: विदेशी निवेश के लिए नियमों को उदार बनाना ताकि वैश्विक तकनीक का लाभ उठाया जा सके।
  • संसाधन आवंटन: थोरियम के दोहन के लिए अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश बढ़ाना।

प्रमुख चुनौतियां एवं चिंताएं

महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के मार्ग में कुछ गंभीर बाधाएं भी हैं:

  • अत्यधिक पूंजी: 100 GW के लक्ष्य के लिए लगभग $200 बिलियन (₹18 लाख करोड़) के भारी निवेश की आवश्यकता है।
  • लंबी निर्माण अवधि: परमाणु परियोजनाओं को पूर्ण होने में वर्षों का समय लगता है, जिससे लागत बढ़ जाती है।
  • नियामक जटिलताएं: कड़े सुरक्षा मानक और अंतरराष्ट्रीय संधियां प्रक्रिया को धीमा करती हैं।
  • जन सुरक्षा और धारणा: फुकुशिमा जैसी घटनाओं के बाद सुरक्षा को लेकर जनता के मन में व्याप्त संशय एक बड़ी चुनौती है।

सर्वश्रेष्ठ विश्लेषण

भारत की ऊर्जा नीति वर्तमान में एक संक्रमण काल से गुजर रही है। केवल सौर और पवन ऊर्जा पर निर्भर रहना औद्योगिक विकास के लिए पर्याप्त नहीं है क्योंकि उनकी प्रकृति अस्थिर है। परमाणु ऊर्जा वह 'मजबूत आधार' प्रदान करती है जो भारत को एक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए आवश्यक है। 'शांति अधिनियम' के माध्यम से निजी क्षेत्र का समावेश इस क्षेत्र में व्याप्त 'सरकारी एकाधिकार' और 'पूंजी की कमी' को दूर करने का एक साहसिक प्रयास है।

आगे की राह

  • संवर्धित वित्तपोषण और निवेश: परमाणु ऊर्जा को 'ग्रीन फाइनेंस' के दायरे में लाकर कम ब्याज दर पर ऋण सुनिश्चित करना तथा ग्रीन बॉन्ड सॉवरेन वेल्थ फंड के माध्यम से निवेश के नए रास्ते खोलना।
  • SMR और निजी सहभागिता: बड़े संयंत्रों के स्थान पर स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMR) को प्राथमिकता देना और निजी उद्योगों को अपने स्वयं के 'कैप्टिव' परमाणु संयंत्र लगाने के लिए प्रोत्साहित करना।
  • नियामक सुदृढ़ीकरण: परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को अधिक स्वायत्त, पारदर्शी और तकनीकी रूप से सक्षम बनाकर नियामक ढांचे में सुधार करना।
  • स्वदेशीकरण और थोरियम मिशन: भारत के त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के तहत थोरियम आधारित तीसरे चरण को शीघ्रता से क्रियान्वित कर आत्मनिर्भरता हासिल करना।
  • मानव संसाधन और जन-विश्वास: विशेष अकादमियों के माध्यम से कुशल इंजीनियरों की कमी को दूर करना और व्यापक जागरूकता अभियानों द्वारा सुरक्षा के प्रति सार्वजनिक विश्वास बढ़ाना।

निष्कर्ष

भारत के लिए परमाणु ऊर्जा केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता है। 2047 के 'विकसित भारत' के स्वप्न को साकार करने और 2070 के 'नेट-जीरो' संकल्प को सिद्ध करने के लिए परमाणु ऊर्जा का विस्तार अपरिहार्य है। यदि हम वित्तीय और नियामक बाधाओं को समय पर दूर कर लेते हैं, तो भारत निश्चित रूप से वैश्विक ऊर्जा मानचित्र पर एक अग्रणी शक्ति के रूप में स्थापित होगा।