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संदर्भ

भारत ने अपनी रक्षा कूटनीति और रणनीतिक साझेदारी को विस्तार देते हुए फरवरी-मार्च 2026 में जापान और अमेरिका के साथ दो महत्वपूर्ण युद्धाभ्यास 'धर्म गार्जियन'और 'वज्र प्रहार' सफलतापूर्वक आयोजित किए हैं।

समाचार के मुख्य बिंदु

  • दोहरा आयोजन: भारत ने एक ही समय में दो प्रमुख वैश्विक शक्तियों (जापान और अमेरिका) के साथ सैन्य प्रशिक्षण साझा किया, जो भारत की बढ़ती वैश्विक सैन्य स्वीकार्यता को दर्शाता है।
  • धर्म गार्जियन 2026: यह भारत और जापान के बीच 7वाँ संस्करण था, जो 24 फरवरी से 9 मार्च 2026 तक चौबटिया (उत्तराखंड) में संपन्न हुआ। इसमें भारतीय सेना की लद्दाख स्काउट्स और जापान की 32वीं इन्फैंट्री रेजिमेंट ने भाग लिया।
  • वज्र प्रहार 2026: भारत-अमेरिका संयुक्त विशेष बल अभ्यास का 16वाँ संस्करण हिमाचल प्रदेश के बकलोह में 24 फरवरी से 16 मार्च 2026 तक आयोजित किया गया।
  • मुख्य फोकस: दोनों अभ्यासों का प्राथमिक उद्देश्य शहरी/अर्ध-शहरी वातावरण में आतंकवाद विरोधी अभियान, संयुक्त मिशन नियोजन और अंतर-संचालनीयता को मजबूत करना था।

'अभ्यास धर्म गार्जियन' के बारे में

  • प्रारंभ: इसकी शुरुआत वर्ष 2018 में हुई थी और यह भारत एवं जापान के बीच एक वार्षिक द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास है।
  • संचालन: यह वैकल्पिक रूप से एक बार भारत में और एक बार जापान में आयोजित किया जाता है।
  • तकनीकी पक्ष: इसमें आधुनिक तकनीकों जैसे ISR ग्रिड (खुफिया, निगरानी और टोही), ड्रोन संचालन और हेलीबोर्न मिशनों का गहन अभ्यास किया जाता है।
  • महत्व: यह केवल सैन्य सहयोग को बढ़ाता है बल्कि चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक 'नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था' सुनिश्चित करने का रणनीतिक संदेश भी देता है।
  • असाही शक्ति (Exercise ASAHI SHAKTI): 2026 के संस्करण में इस नाम से एक 'वैलिडेशन एक्सरसाइज' आयोजित की गई, जिसमें 48 घंटे के सिम्युलेटेड युद्ध परिदृश्य में आतंकवादियों के विरुद्ध संयुक्त ऑपरेशन का परीक्षण किया गया।

निष्कर्ष

ये सैन्य अभ्यास भारत की सैन्य तत्परता को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालने और मित्र देशों के साथ सामरिक विश्वास बनाने के लिए अनिवार्य हैं। अंततः, ये अभ्यास क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने और साझा सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए एक मजबूत सुरक्षा ढांचा प्रदान करते हैं।


संदर्भ

ईटीएच ज्यूरिख के शोधकर्ताओं ने पहली बार यह खोज की है कि मध्य कांगो बेसिन की विशाल पीटलैंड झीलों से हजारों साल पुराना 'प्राचीन कार्बन' वायुमंडल में मुक्त हो रहा है। यह अध्ययन 'नेचर जियोसाइंस' में प्रकाशित हुआ है, जो सदियों से सुरक्षित माने जाने वाले कार्बन भंडारों के अस्थिर होने की चेतावनी देता है।

मुख्य समाचार बिंदु

  • प्राचीन कार्बन का रिसाव: कांगो बेसिन की 'ब्लैकवॉटर' झीलों (जैसे लैक माई न्दोम्बे और लैक तुम्बा) से उत्सर्जित होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का 40% हिस्सा हजारों साल पुराने 'पीट' से रहा है।
  • रेडियोकार्बन डेटिंग का उपयोग: वैज्ञानिकों ने झील के पानी में घुली CO2 की आयु निर्धारित करने के लिए रेडियोकार्बन डेटिंग का उपयोग किया, जिससे यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ।
  • ब्लैकवॉटर झीलों की भूमिका: इन झीलों का रंग पौधों के मलबे के घुलने के कारण 'काली चाय' जैसा गहरा होता है। ये झीलें अब कार्बन 'सिंक' के बजाय कार्बन 'स्रोत' के रूप में कार्य कर रही हैं।
  • मीथेन उत्सर्जन और जल स्तर: एक समानांतर अध्ययन के अनुसार, झील का जल स्तर गिरने पर सूक्ष्मजीव मीथेन को कम प्रभावी ढंग से तोड़ पाते हैं, जिससे शुष्क मौसम में मीथेन का उत्सर्जन बढ़ जाता है।
  • अज्ञात मार्ग: अभी तक यह वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट नहीं है कि पीट की गहराई में दबा कार्बन किस भौतिक या रासायनिक मार्ग से झीलों तक पहुँच रहा है।

कांगो बेसिन: भौगोलिक एवं रणनीतिक महत्व

कांगो बेसिन अफ्रीका के हृदय में स्थित है और वैश्विक पारिस्थितिकी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  • विस्तार: यह मध्य अफ्रीका के छह देशों (कैमरून, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, कांगो गणराज्य, लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो, इक्वेटोरियल गिनी और गैबॉन) में फैला है।
  • पृथ्वी के फेफड़े: अमेज़न के बाद यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय वर्षावन है। इसे 'अफ्रीका के फेफड़े' कहा जाता है।
  • पीटलैंड भंडार: कांगो बेसिन के दलदल पृथ्वी की सतह का केवल 0.3% हैं, लेकिन वे दुनिया के उष्णकटिबंधीय पीटलैंड कार्बन का एक-तिहाई (1/3) हिस्सा संचित करते हैं (लगभग 30 गीगाटन कार्बन)
  • रुकी नदी: यह कांगो की सहायक नदी है और दुनिया की सबसे गहरे रंग की ब्लैकवॉटर नदियों में से एक मानी जाती है।
  • जैव विविधता: यहाँ चिंपांजी, बोनोबो और वन हाथियों जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

प्रभाव और निहितार्थ

  • ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि: हजारों वर्षों से जमा प्राचीन कार्बन का अचानक मुक्त होना वैश्विक तापमान में वृद्धि को और तेज करेगा।
  • टिपिंग पॉइंट: शोधकर्ताओं को डर है कि यह उत्सर्जन एक ऐसे निर्णायक बिंदु  की ओर ले जा रहा है, जहाँ से पारिस्थितिकी तंत्र को वापस सामान्य करना असंभव होगा।
  • भूमि उपयोग में परिवर्तन: 2050 तक कांगो की आबादी तीन गुना होने का अनुमान है। कृषि के लिए वनों की कटाई से 'वाष्पोत्सर्जन' कम होगा, जिससे वर्षा कम होगी और पीटलैंड सूख जाएंगे।
  • जलवायु मॉडल में त्रुटि: अब तक वैश्विक जलवायु मॉडलों में उष्णकटिबंधीय झीलों और पीटलैंड्स के इस प्रभाव को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है, जिससे भविष्य के अनुमान गलत हो सकते हैं।

निष्कर्ष

कांगो बेसिन की झीलों से प्राचीन कार्बन का रिसाव एक गंभीर 'पारिस्थितिक चेतावनी' है। यह स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन केवल भविष्य की समस्या नहीं है, बल्कि यह हमारे प्राचीन प्राकृतिक सुरक्षा चक्रों को भी नष्ट कर रहा है। वनों की कटाई को रोकना और इन जल क्षेत्रों के स्तर को बनाए रखना केवल अफ्रीका के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु स्थिरता के लिए अनिवार्य है। यदि 'पृथ्वी के फेफड़े' (वर्षावन) और 'कार्बन बैंक' (पीटलैंड) इसी तरह असुरक्षित रहे, तो नेट-ज़ीरो (Net-Zero) के लक्ष्यों को प्राप्त करना असंभव होगा।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन


संदर्भ

असम के काजीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व (KNPTR) में आयोजित सातवीं जलपक्षी गणना के दौरान एक दुर्लभ मेहमान, स्म्यू, ने पक्षीविदों का ध्यान आकर्षित किया है। यूरेशिया के टैगा क्षेत्रों में प्रजनन करने वाली यह डाइविंग डक (गोताखोर बत्तख) पहली बार काजीरंगा के परिदृश्य में देखी गई है। यह घटना जहाँ एक ओर असम की आर्द्रभूमियों की समृद्ध जैव विविधता को दर्शाती है, वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिकों के लिए जलवायु परिवर्तन से प्रेरित पक्षियों के बदलते प्रवास पैटर्न पर चिंता का विषय भी है।

'स्म्यू': एक संक्षिप्त परिचय

  • वैज्ञानिक नाम: Mergellus albellus
  • प्रकार: यह एक छोटी डाइविंग डक है जो मुख्य रूप से यूरेशिया के उत्तरी जंगलों (टैगा) में प्रजनन करती है।
  • विशेषता: यह सर्दियों के दौरान मछली से भरपूर और सुरक्षित जल निकायों (Wetlands) की तलाश में दक्षिण की ओर प्रवास करती है।
  • भारत में स्थिति: भारत में यह एक 'वेग्रेन्ट' यानी भटककर आने वाला दुर्लभ पक्षी माना जाता है। इसे आमतौर पर उत्तर या मध्य भारत की आर्द्रभूमियों में देखा जाता है, लेकिन असम में इसका पहली बार देखा जाना ऐतिहासिक है।
  • संरक्षण स्थिति (IUCN): वैश्विक स्तर पर इसे 'कम चिंताजनक' श्रेणी में रखा गया है, लेकिन आवास विनाश और मानवीय हस्तक्षेप के कारण इसकी वैश्विक आबादी (लगभग 1.3 लाख) में गिरावट देखी जा रही है।

गणना के प्रमुख आंकड़े

7वीं जलपक्षी गणना (4-11 जनवरी) के परिणाम निम्नलिखित हैं:

  • कुल पक्षी: 1,05,540 (पिछले वर्ष 2025 की तुलना में लगभग 6,522 की गिरावट)
  • कुल प्रजातियां: 107 (पिछले वर्ष की तुलना में 17 प्रजातियां कम)
  • प्रमुख प्रजातियां: बार-हेडेड गूज, नॉर्न पिनटेल और लेसर व्हिसलिंग डक।
  • महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियाँ: लाओखोवा की रौमारी बील (संख्या और विविधता दोनों में शीर्ष पर)
  • शीर्ष आर्द्रभूमियाँ: पक्षियों की संख्या के मामले में शीर्ष पांच आर्द्रभूमियाँ लाओखोवा की रौमारी बील (15,661 पक्षी), दोंदुआ बील (14,469), कतखाल (4,979), सोहोला (3,612) और खलिहामारी (3,463) थीं। विविधता के मामले में शीर्ष पांच आर्द्रभूमियाँ रौमारी (77 प्रजातियाँ), दोंदुआ (71), सोहोला (69), कावोइमारी-भोइसामारी-दिफ्फुलो (57) और वरवरी (53) थीं।

जलवायु परिवर्तन और प्रजाति प्रवास: एक विश्लेषण

स्म्यू का काजीरंगा में दिखना 'खुशी' के साथ 'चिंता' का विषय इसलिए है क्योंकि यह 'रेंज शिफ्ट' का संकेत देता है:

  • जलवायु-प्रेरित प्रवास: ग्लोबल वार्मिंग के कारण पक्षियों के पारंपरिक प्रवास मार्ग बदल रहे हैं। तापमान में वृद्धि प्रवासियों को नए और गैर-पारंपरिक क्षेत्रों की ओर भटकने पर मजबूर कर रही है।
  • आर्द्रभूमि लचीलापन:स्म्यू का आगमन यह दर्शाता है कि काजीरंगा का पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी प्रवासियों के लिए 'रिफ्यूलिंग स्टॉप' के रूप में सुरक्षित है।

चुनौतियाँ और खतरे

जनगणना रिपोर्ट ने संरक्षण के लिए प्रमुख खतरों को रेखांकित किया है:

  • निवास स्थान का नुकसान: आर्द्रभूमियों पर अतिक्रमण और गाद का जमा होना।
  • प्रदूषण: तेल प्रदूषण और शिकार की छिटपुट घटनाएं फ्लाईवे प्रवासियों के लिए बड़ा खतरा हैं।
  • लुप्तप्राय प्रजातियां: काजीरंगा में IUCN की रेड लिस्ट में शामिल 18 ऐसी प्रजातियां दर्ज की गईं जो गंभीर रूप से लुप्तप्राय या सुभेद्य हैं।

सरकारी प्रयास और संरक्षण रणनीतियाँ

  • अतिक्रमण विरोधी अभियान: असम सरकार लाओखोवा और बुराचापोरी जैसे वन्यजीव अभयारण्यों में अतिक्रमण हटाने पर जोर दे रही है ताकि महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्रों (IBAs) को बहाल किया जा सके।
  • आर्द्रभूमि संरक्षण: 166 आर्द्रभूमियों के सर्वेक्षण के माध्यम से सरकार लक्षित संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
  • संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 51A(g) के तहत वन्यजीवों और झीलों का संरक्षण प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है, जिसे 'प्रोजेक्ट टाइगर और एलीफेंट' के तहत मजबूती दी जा रही है।

आगे की राह

  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: स्म्यू जैसे प्रवासी पक्षी 'मध्य एशियाई फ्लाईवे' का उपयोग करते हैं, जिसके लिए सीमा पार सहयोग और निवास स्थान की सुरक्षा अनिवार्य है।
  • जलवायु अनुकूलन: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने के लिए दीर्घकालिक निगरानी की आवश्यकता है ताकि पक्षियों के बदलते व्यवहार के अनुसार नीतियां बनाई जा सकें।
  • सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदायों को आर्द्रभूमि संरक्षण और इको-टूरिज्म से जोड़कर शिकार की घटनाओं को शून्य किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

काजीरंगा में स्म्यू की उपस्थिति केवल एक रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि यह प्रकृति का एक चेतावनी भरा संदेश है। यह दर्शाता है कि हमारी आर्द्रभूमियाँ वैश्विक जैव विविधता के लिए कितनी महत्वपूर्ण हैं। 'स्म्यू' जैसे दुर्लभ अतिथियों का स्वागत तभी सुनिश्चित किया जा सकता है जब हम जलवायु परिवर्तन के प्रति अपनी नीतियों को और अधिक संवेदनशील और प्रभावी बनाएंगे।


सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।


संदर्भ

सितंबर 2018 में, सर्वोच्च न्यायालय ने 'इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य' मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश को अनुमति दी थी। वर्तमान में, नौ न्यायाधीशों की एक वृहद पीठ उन पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जो इस निर्णय को चुनौती देती हैं। यह मामला भारत में 'आस्था के अधिकार' और 'लैंगिक समानता' के बीच संतुलन की एक नई परिभाषा तय करेगा।

सबरीमाला निर्णय (2018) के प्रमुख निष्कर्ष

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली 4:1 के बहुमत वाली पीठ ने निम्नलिखित आधारों पर अपना निर्णय दिया था:

  • धार्मिक संप्रदाय की व्याख्या: न्यायालय ने माना कि भगवान अयप्पा के भक्त एक अलग 'धार्मिक संप्रदाय' नहीं हैं, अतः वे अनुच्छेद 26 के तहत पूर्ण स्वायत्तता का दावा नहीं कर सकते।
  • मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं पर प्रतिबंध को अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 14 (समानता) का उल्लंघन माना गया।
  • नियमों की असंवैधानिक स्थिति: केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल नियम, 1965 का नियम 3(b) असंवैधानिक घोषित किया गया क्योंकि यह मूल अधिनियम की धारा 3 (सभी हिंदुओं के लिए समान प्रवेश) के विरुद्ध था।

'अनिवार्य धार्मिक प्रथा' (ERP) का सिद्धांत और उसकी सीमाएँ

दशकों से, न्यायालय यह निर्धारित करने के लिए कि कौन सी प्रथा सुरक्षित है, 'अनिवार्य धार्मिक प्रथा' (ERP) परीक्षण का उपयोग करता रहा है।

  • समस्या: इस परीक्षण के माध्यम से न्यायालय स्वयं 'धर्मशास्त्रीय निर्णय' लेने लगता है कि धर्म के लिए क्या अनिवार्य है और क्या नहीं।
  • आलोचना: न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के अनुसार, यह न्यायालय को एक 'धार्मिक चोला' ओढ़ने पर मजबूर करता है, जो धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के विरुद्ध है। यह साक्ष्यों और गवाहों के बिना केवल ग्रंथों के आधार पर निष्कर्ष निकालता है।

विहिष्करण-विरोधी परीक्षण  

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ द्वारा प्रस्तावित यह नया सिद्धांत धर्मशास्त्र के बजाय संवैधानिक मूल्यों पर केंद्रित है।

  • यह परीक्षण यह नहीं पूछता: "क्या यह प्रथा धर्म का अनिवार्य हिस्सा है?"
  • बल्कि यह पूछता है: "क्या इस प्रथा का प्रभाव किसी व्यक्ति को समाज या नागरिक जीवन से बाहर करता है या उसकी गरिमा को चोट पहुँचाता है?"

न्यायिक मत: मतभेद और तर्क

2018 के 4:1 के निर्णय में न्यायाधीशों के वक्तव्य भारतीय न्यायशास्त्र के दो अलग-अलग ध्रुवों को दर्शाते हैं:

न्यायाधीश

प्रमुख वक्तव्य और दृष्टिकोण

CJI दीपक मिश्रा एवं न्यायमूर्ति खानविलकर

"धर्म के नाम पर पितृसत्तात्मक धारणाओं को अनुमति नहीं दी जा सकती। मासिक धर्म के आधार पर बहिष्कार महिलाओं की गरिमा के विरुद्ध है।"

न्यायमुर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़

"संविधान का उद्देश्य समाज का परिवर्तन है। कोई भी प्रथा जो महिला को उसकी जैविक स्थिति के कारण 'अपवित्र' मानती है, वह संविधान के विरुद्ध है।"

न्यायमूर्ति रोहिंटन नरीमन

"संवैधानिक नैतिकता केवल प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है, यह उन मूल्यों के बारे में है जो समावेशिता और गरिमा सुनिश्चित करते हैं।"

न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा (असहमति)

"एक धर्मनिरपेक्ष देश में, अदालत को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन सी धार्मिक प्रथा तर्कसंगत है या नहीं। समुदायों को अपने रीति-रिवाजों के पालन की स्वायत्तता होनी चाहिए।"

संभावित प्रभाव और अन्य विवाद

नौ न्यायाधीशों की पीठ का निर्णय केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह निम्नलिखित विषयों पर भी दूरगामी प्रभाव डालेगा:

  • यदि 2018 के निर्णय को 'ज्यों का त्यों' रखा जाता है

यदि न्यायालय महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को बरकरार रखता है, तो इसके निम्नलिखित सकारात्मक और व्यापक प्रभाव होंगे:

  • मानवीय गरिमा और लैंगिक समानता की विजय: यह निर्णय इस सिद्धांत को पुख्ता करेगा कि किसी भी महिला की जैविक स्थिति (मासिक धर्म) उसे 'अपवित्र' नहीं बनाती। यह महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक मानने वाली पितृसत्तात्मक सोच पर एक संवैधानिक प्रहार होगा।
  • 'विहिष्करण-विरोधी परीक्षण' का सुदृढ़ीकरण: यह स्थापित होगा कि 'आस्था' का अधिकार किसी को 'बहिष्कृत' करने का लाइसेंस नहीं है। यदि कोई परंपरा गरिमा का हनन करती है, तो उसे हटना ही होगा।
  • सामाजिक सुधार की निरंतरता: यह अन्य धर्मों (जैसे मस्जिदों में प्रवेश या पारसी महिलाओं के अधिकार) के लिए एक 'लीगल मिसाल' बनेगा, जिससे पूरे भारतीय समाज में सुधार की लहर आएगी।
  • संवैधानिक नैतिकता की सर्वोच्चता: यह सिद्ध करेगा कि 'संवैधानिक नैतिकता' किसी भी 'सामाजिक या धार्मिक नैतिकता' से ऊपर है।
  • यदि निर्णय बदलकर 'पुनः प्रतिबंध' लगाया जाता है

यदि न्यायालय परंपरा का हवाला देते हुए महिलाओं के प्रवेश पर फिर से रोक लगा देता है, तो इसके गंभीर और नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं:

  • लैंगिक न्याय को गहरा आघात: महिलाओं के लिए यह संदेश जाएगा कि उनकी 'जैविक वास्तविकता' उनके 'संवैधानिक अधिकारों' से बड़ी है। यह समानता के संघर्ष को दशकों पीछे धकेल सकता है।
  • समुदायों की 'पूर्ण स्वायत्तता' का उदय: इससे धार्मिक संप्रदायों को यह शक्ति मिल जाएगी कि वे 'परंपरा' के नाम पर किसी भी प्रकार का भेदभावपूर्ण आचरण करें, जिससे राज्य का हस्तक्षेप सीमित हो जाएगा।
  • अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता) की संकीर्ण व्याख्या: यदि मासिक धर्म आधारित बहिष्कार को मान्य किया जाता है, तो 'शुद्धता और अशुद्धता' की धारणाओं को कानूनी मान्यता मिल जाएगी, जिसे संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 17 के माध्यम से खत्म करने का सपना देखा था।
  • अन्य सुधारवादी याचिकाओं का अंत: यह निर्णय भविष्य में होने वाले अन्य धार्मिक सुधारों (जैसे मुस्लिम या पारसी महिलाओं के अधिकार) के दरवाज़े बंद कर सकता है।
  • महिलाओं के हितों और सामाजिक स्थिति पर प्रभाव

महिलाओं के दृष्टिकोण से यह मुद्दा केवल 'मंदिर प्रवेश' का नहीं, बल्कि 'सार्वजनिक स्थान पर अधिकार' का है:

  • सामाजिक स्थिति: प्रतिबंध हटने से महिलाओं की सामाजिक स्थिति 'वस्तु' से बदलकर 'संवैधानिक इकाई' के रूप में सुदृढ़ होती है। यह समाज में व्याप्त 'मासिक धर्म से जुड़ी वर्जनाओं' को तोड़ने में मदद करता है।
  • संवैधानिक सुरक्षा: अनुच्छेद 15 (लिंग के आधार पर भेदभाव करना) और अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन) तभी सार्थक हैं जब वे जीवन के हर क्षेत्र, चाहे वह धार्मिक हो या सामाजिक, में लागू हों।
  • भागीदारी: यह निर्णय तय करेगा कि क्या महिलाएँ भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में 'समान भागीदार' हैं या केवल 'मूक दर्शक'

संवैधानिक नैतिकता बनाम सामाजिक प्रथा

भारतीय संविधान के निर्माताओं ने माना था कि भारत में धर्म और सामाजिक जीवन अविभाज्य हैं। इसलिए, न्यायालय पूरी तरह से उदासीन नहीं रह सकता।

  • व्यक्ति बनाम समुदाय: यदि व्यक्ति संविधान की मूल इकाई है, तो समुदाय के दावे व्यक्ति के उन अधिकारों को नहीं छीन सकते जो उसके सार्वजनिक और नागरिक जीवन को आकार देते हैं।

निष्कर्ष

सबरीमाला विवाद मात्र एक मंदिर में प्रवेश का मामला नहीं है, बल्कि यह इस प्रश्न का उत्तर है कि क्या 'परंपरा' को 'मानवीय गरिमा' पर वरीयता दी जा सकती है। 'विहिष्करण-विरोधी परीक्षण' एक ऐसा संतुलित मार्ग प्रदान करता है जो विश्वास की स्वायत्तता की रक्षा भी करता है और यह सुनिश्चित भी करता है कि आस्था के नाम पर किसी के साथ भेदभाव हो। यह संविधान के उस 'परिवर्तनकारी वादे' के अनुरूप है जो प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन की गारंटी देता है।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध


संदर्भ

भारत में जनसंख्या नियंत्रण की बहस दशकों पुरानी है, जहाँ राज्य सरकारों ने समय-समय पर 'प्रोत्साहन और दंड' की नीति अपनाई है। राजस्थान इस दिशा में अग्रणी रहा है, जिसने 1990 के दशक में जनसंख्या विस्फोट को रोकने के लिए विधायी हस्तक्षेप का मार्ग चुना था, जो वर्तमान में जनसांख्यिकीय बदलाव के कारण पुनः चर्चा में है।

'दो-बच्चे का नियम' क्या है?

यह एक कानूनी पात्रता मानदंड है जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को स्थानीय निकाय (पंचायत या नगरपालिका) का चुनाव लड़ने के लिए तभी पात्र माना जाता है, यदि उसके जीवित बच्चों की संख्या दो या उससे कम हो। यह नियम 'प्रतिगामी अयोग्यता' के सिद्धांत पर कार्य करता था, जहाँ तीसरी संतान का जन्म होते ही व्यक्ति निर्वाचित पद के लिए अयोग्य हो जाता था।

चर्चा के कारण

  • हाल ही में राजस्थान कैबिनेट ने इस 30 साल पुराने नियम को समाप्त करने हेतु राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 और राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 में संशोधन को मंजूरी दी है।
  • चर्चा का मुख्य केंद्र यह है कि क्या जनसंख्या नियंत्रण के लिए दंडात्मक कानून अब भी प्रासंगिक हैं, जबकि राज्य की कुल प्रजनन दर (TFR) पहले ही प्रतिस्थापन स्तर तक पहुँच चुकी है।

नियम को हटाने के कारण

  • प्रजनन दर में गिरावट: 1991-94 में राजस्थान की TFR 3.6 थी, जो अब गिरकर 2.0 हो गई है। अतः नियम का मूल उद्देश्य स्वतः पूर्ण हो चुका है।
  • लोकतांत्रिक समावेशिता: यह नियम समाज के उन वंचित वर्गों (SC/ST और ग्रामीण क्षेत्रों) के विरुद्ध भेदभावपूर्ण माना गया जहाँ शिक्षा के अभाव में परिवार बड़े होते हैं।
  • संवैधानिक न्याय: आलोचकों का तर्क है कि यह नियम नागरिक के चुनाव लड़ने के 'वैधानिक अधिकार' में अनुचित बाधा उत्पन्न करता था।
  • सामाजिक परिवर्तन: बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में अब लोग स्वयं छोटे परिवार को प्राथमिकता दे रहे हैं।

प्रभाव एवं महत्व

  • राजनीतिक सशक्तिकरण: यह निर्णय स्थानीय स्तर पर नेतृत्व की पाइपलाइन को व्यापक बनाएगा, जिससे अधिक लोग लोकतंत्र का हिस्सा बन सकेंगे।
  • कानूनी जटिलताओं में कमी: संतानों की संख्या को लेकर होने वाले चुनावी मुकदमों और फर्जी हलफनामों की समस्याओं का अंत होगा।
  • प्रशासनिक सुगमता: निर्वाचन अधिकारियों के लिए पात्रता की जाँच प्रक्रिया सरल हो जाएगी।

नियम का मूल इतिहास और स्थापना

यह नियम 1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत की सरकार द्वारा लागू किया गया था। इसका उद्देश्य स्थानीय जनप्रतिनिधियों को समाज के लिए 'रोल मॉडल' बनाना था ताकि वे छोटे परिवार के संदेश को जन-जन तक पहुँचा सकें। उस समय राजस्थान 'बीमारू' राज्यों की श्रेणी में था और जनसंख्या वृद्धि एक गंभीर चुनौती थी।

भारत के अन्य राज्यों की स्थिति

  • विद्यमान नियम वाले राज्य: गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में स्थानीय चुनावों के लिए अभी भी यह सीमा लागू है।
  • असम: यहाँ नियम अधिक कठोर है, जहाँ 2021 से दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्ति तो चुनाव लड़ सकते हैं और ही सरकारी नौकरी प्राप्त कर सकते हैं।
  • उत्तराखंड: यहाँ भी पंचायतों के लिए समान नियम लागू है।
  • उत्तर प्रदेश: राज्य विधि आयोग ने जनसंख्या नियंत्रण विधेयक (Draft) का प्रस्ताव दिया है, जिसमें दो-बच्चे की नीति का उल्लंघन करने वालों पर कड़े प्रतिबंधों की अनुशंसा की गई है।

संवैधानिक प्रावधान एवं भारत सरकार की नियमावली

  • राज्य सूची: संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत 'स्थानीय स्वशासन' राज्य का विषय है, जिससे राज्यों को पात्रता नियम बनाने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है।
  • न्यायिक निर्णय: 'जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003)' में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि दो-बच्चे का नियम अनुच्छेद 14 (समानता) का उल्लंघन नहीं करता क्योंकि यह जनसंख्या नियंत्रण के व्यापक जनहित के उद्देश्य से प्रेरित है।
  • राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000: केंद्र सरकार की आधिकारिक नीति 'स्वैच्छिक और सूचित विकल्प' पर आधारित है, कि अनिवार्य प्रतिबंधों पर।

वैश्विक परिदृश्य

  • चीन: 'वन-चाइल्ड पॉलिसी' (1979-2015) के कारण वृद्ध होती जनसंख्या की समस्या से निपटने के लिए अब चीन 'थ्री-चाइल्ड पॉलिसी' को बढ़ावा दे रहा है।
  • सिंगापुर: पहले "Stop at Two" की नीति अपनाई, लेकिन अब घटती आबादी के कारण प्रजनन प्रोत्साहन दे रहा है।
  • लोकतांत्रिक देश: अधिकांश पश्चिमी लोकतंत्रों में ऐसी कोई कानूनी पाबंदी नहीं है; वहाँ जनसंख्या नियंत्रण शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा के माध्यम से स्वतः प्राप्त हुआ है।

विश्लेषण

जनसंख्या नियंत्रण के लिए दंडात्मक विधियों का युग अब समाप्त हो रहा है, क्योंकि सामाजिक चेतना और स्वास्थ्य सुविधाओं ने 'मजबूरी' को 'स्वैच्छिक विकल्प' में बदल दिया है। राजस्थान का यह निर्णय लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनः स्थापना और जनसांख्यिकीय परिपक्वता का परिचायक है।

आगे की राह

  • सरकारों को अब 'संख्या नियंत्रण' के स्थान पर 'गुणवत्तापूर्ण जनसंख्या' पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • महिला शिक्षा, लैंगिक समानता और गर्भनिरोधक सेवाओं की सुलभता ऐसे उपकरण हैं जो बिना किसी दंडात्मक कानून के जनसंख्या स्थिरीकरण को स्थायी बना सकते हैं।

निष्कर्ष

राजस्थान द्वारा 'दो-बच्चे के मानदंड' को हटाना एक प्रगतिशील कदम है, जो कानूनी बाध्यता के स्थान पर जनसांख्यिकीय परिपक्वता (घटती TFR) और लोकतांत्रिक समावेशिता को प्राथमिकता देता है। यह निर्णय नागरिक स्वतंत्रता और चुनावी भागीदारी को सशक्त बनाएगा, बशर्ते सरकार इसे जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों में शिथिलता के रूप में ले। भविष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता के माध्यम से 'छोटे परिवार' के आदर्श को एक स्थायी 'सामाजिक मूल्य' के रूप में कितना सुदृढ़ कर पाता है।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- I  भारतीय विरासत और संस्कृति, विश्व का इतिहास एवं भूगोल और समाज

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

संदर्भ

दशकों से भारत में बोतलबंद पानी को शुद्धता का पर्याय माना जाता रहा है। सार्वजनिक नल के पानी पर अविश्वास और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता ने इसे एक विलासिता से बदलकर दैनिक आवश्यकता बना दिया है। रेलवे स्टेशनों से लेकर बड़े समारोहों तक, प्लास्टिक में सील पानी को सुरक्षित मानकर अपनाया गया। हालांकि, हालिया वैज्ञानिक शोधों ने इस 'सुरक्षा के कवच' पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे यह चर्चा अब केवल बैक्टीरिया से हटकर अदृश्य सूक्ष्म-प्लास्टिक कणों तक पहुँच गई है।

पैकेज्ड पेयजल क्या है?

पैकेज्ड पेयजल वह पानी है जिसे किसी भी स्रोत (जैसे भूमिगत जल या सार्वजनिक आपूर्ति) से प्राप्त कर उसे विभिन्न शोधन प्रक्रियाओं (जैसे फिल्ट्रेशन, यूवी ट्रीटमेंट, रिवर्स ऑस्मोसिस) से गुजारा जाता है और फिर प्लास्टिक या कांच की बोतलों में सील कर दिया जाता है। भारत में यह मुख्य रूप से 'पॉलीइथिलीन टेरेफ्थेलेट' (PET) बोतलों में उपलब्ध होता है, जिसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने का दावा किया जाता है।

चर्चा के कारण: हालिया घटनाक्रम

हाल ही में यह विषय अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर निम्नलिखित कारणों से चर्चा में है:

  • कोलंबिया विश्वविद्यालय का शोध: 'प्रोसीडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज' (PNAS) में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, एक लीटर बोतलबंद पानी में औसतन 2,40,000 प्लास्टिक के सूक्ष्म कण पाए गए हैं।
  • भारतीय शहरों का अध्ययन: नागपुर, मुंबई और तटीय आंध्र प्रदेश के बोतलबंद पानी के नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक्स की उपस्थिति दर्ज की गई है।
  • नैनोप्लास्टिक्स का पता चलना: नई इमेजिंग तकनीक के माध्यम से अब नैनोप्लास्टिक्स की पहचान हो पा रही है, जो पहले अदृश्य थे।
  • नियामक अंतराल: FSSAI और BIS के वर्तमान मानकों में माइक्रोप्लास्टिक्स की जांच के लिए अनिवार्य प्रावधानों का अभाव।

अवधारणा परिवर्तन: दृश्य बैक्टीरिया से अदृश्य कणों की ओर

पारंपरिक रूप से पानी की शुद्धता का मापदंड सूक्ष्मजीवविज्ञानी सुरक्षा, जैसे बैक्टीरिया, वायरस और रोगजनकों की अनुपस्थिति तक सीमित था। लेकिन अब ध्यान 'भौतिक-रासायनिक' जोखिमों की ओर स्थानांतरित हो गया है। अब खतरा केवल दूषित पानी से नहीं, बल्कि उस प्लास्टिक पात्र से है जिसमें वह रखा गया है। यह 'दृश्य संदूषक' से 'अदृश्य सूक्ष्म-प्रदूषकों' की ओर एक बड़ा वैचारिक बदलाव है।

माइक्रोप्लास्टिक क्या है?

माइक्रोप्लास्टिक प्लास्टिक के वे कण हैं जिनका आकार 5 मिलीमीटर से छोटा होता है। इन्हें दो श्रेणियों में बांटा जाता है:

  • प्राथमिक माइक्रोप्लास्टिक: ये सीधे कॉस्मेटिक्स या औद्योगिक उत्पादों में उपयोग के लिए छोटे बनाए जाते हैं।
  • द्वितीयक माइक्रोप्लास्टिक: ये बड़ी प्लास्टिक वस्तुओं (जैसे पानी की बोतलें) के घर्षण, गर्मी और सूर्य की पराबैंगनी (UV) किरणों के कारण टूटने से बनते हैं।
  • नैनोप्लास्टिक: ये माइक्रोप्लास्टिक से भी छोटे (1 माइक्रोमीटर से कम) होते हैं। ये इतने सूक्ष्म होते हैं कि मानव रक्त प्रवाह और कोशिकाओं में प्रवेश करने में सक्षम होते हैं।

माइक्रोप्लास्टिक के प्रभाव

बोतलबंद पानी के माध्यम से इन कणों के सेवन के परिणाम बहुआयामी हैं:

  • स्वास्थ्य प्रभाव: छोटे कण (नैनोप्लास्टिक्स) जैविक बाधाओं (जैसे ब्लड-ब्रेन बैरियर और प्लेसेंटा) को पार कर सकते हैं, जिससे अंगों में सूजन और सेलुलर क्षति का खतरा बढ़ जाता है।
  • केमिकल लीचिंग: PET बोतलों से एंटीमनी, फ़ेथलेट्स और बिस्फेनॉल-A (BPA) जैसे रसायन पानी में घुल जाते हैं। ये रसायन 'एंडोक्राइन डिस्रप्टर्स' हैं, जो हार्मोनल असंतुलन और प्रजनन संबंधी समस्याओं का कारण बनते हैं।
  • पर्यावरणीय पदचिह्न: सिंगल-यूज़ प्लास्टिक बोतलें कचरे का अंबार लगाती हैं, जो अंततः नदियों और समुद्रों के माध्यम से फिर से हमारे खाद्य चक्र का हिस्सा बन जाती हैं।

अन्य विकल्प

  • उपयोग स्थल पर शोधन: घरों में अच्छी गुणवत्ता वाले फिल्टर का उपयोग, जो कणों को प्रभावी ढंग से हटा सकें।
  • कांच या स्टील के पात्र: प्लास्टिक के बजाय तांबे, कांच या स्टेनलेस स्टील की बोतलों का उपयोग करना।
  • सार्वजनिक जल वितरण:रीफिल केंद्रऔर सार्वजनिक पेयजल प्रणालियों (जैसे 'Water ATMs') को मजबूत करना।

महत्वपूर्ण आंकड़े और रिपोर्ट

  • PNAS रिपोर्ट (2024): बोतलबंद पानी में नैनोप्लास्टिक्स की मात्रा पिछले अनुमानों से 10 से 100 गुना अधिक पाई गई।
  • नागपुर अध्ययन: प्रति लीटर बोतलबंद पानी में 72 से 212 माइक्रोप्लास्टिक कणों की उपस्थिति।
  • प्लास्टिक कचरा: भारत सालाना लगभग 3.5 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करता है, जिसमें पानी की बोतलों का बड़ा हिस्सा है।

सरकारी पहल और संवैधानिक प्रावधान

  • संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 21 के तहत 'स्वच्छ पेयजल' का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है। अनुच्छेद 47 राज्य को सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार का निर्देश देता है।
  • नियामक निकाय: भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) और भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) इसके मानक तय करते हैं।
  • प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम (2016/2022): सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के उपयोग को हतोत्साहित करने और 'विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व' (EPR) को लागू करने का प्रावधान।

विश्लेषण

समस्या का मूल 'नियामक अंतराल' और 'आपूर्ति श्रृंखला' में है। भारत में अत्यधिक तापमान बोतलों से रसायनों के रिसाव को तेज करता है। विडंबना यह है कि जिसे हम सुरक्षा के लिए खरीदते हैं, वही हमारी कोशिकाओं के लिए खतरा बन रहा है। यह 'मार्केट फेल्योर' का उदाहरण है जहाँ उपभोक्ता को उत्पाद की दीर्घकालिक सुरक्षा की पूरी जानकारी नहीं होती। नैनोप्लास्टिक्स पर मौजूदा नियमों की चुप्पी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चूक है।

आगे की राह

  • मानकों का अद्यतनीकरण: FSSAI और BIS को पानी में माइक्रोप्लास्टिक्स की अधिकतम सीमा निर्धारित करनी चाहिए।
  • नगरपालिका सुदृढ़ीकरण: सार्वजनिक नल के पानी की गुणवत्ता इतनी बेहतर और पारदर्शी होनी चाहिए कि बोतलबंद पानी की आवश्यकता ही रहे।
  • जागरूकता: उपभोक्ताओं को बोतलों को गर्मी में रखने या उन्हें दोबारा उपयोग करने के खतरों के प्रति शिक्षित करना।
  • अनुसंधान: नैनोप्लास्टिक्स के मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों पर अधिक गहन क्लिनिकल परीक्षणों की आवश्यकता।

निष्कर्ष

बोतलबंद पानी का संकट वैज्ञानिक साक्ष्यों और नीतिगत निष्क्रियता के बीच के संघर्ष को दर्शाता है। जब नुकसान के प्रमाण स्पष्ट हों, तो जिम्मेदारी नियामक संस्थानों की होती है कि वे पारदर्शिता सुनिश्चित करें। 'सुरक्षित पानी' का अर्थ केवल बैक्टीरिया-मुक्त पानी नहीं, बल्कि सूक्ष्म-प्रदूषकों से मुक्त पानी होना चाहिए। अंततः, प्लास्टिक पर हमारी निर्भरता को कम करना ही मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए एकमात्र स्थायी समाधान है।