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संदर्भ

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और निर्यातकों द्वारा अर्जित किए जा रहे अप्रत्याशित लाभ को देखते हुए, भारत सरकार ने निर्यात आधारित डीजल और विमानन टरबाइन ईंधन (ATF) पर विंडफॉल टैक्स में तत्काल प्रभाव से बड़ी वृद्धि की घोषणा की है।


मुख्य समाचार बिंदु

  • लेवी में भारी वृद्धि: डीजल पर विंडफॉल लेवी को 21.5 प्रति लीटर से बढ़ाकर ₹55.5 प्रति लीटर कर दिया गया है (लगभग 158% की वृद्धि) इसी प्रकार, एटीएफ पर इसे 29.5 से बढ़ाकर ₹42 प्रति लीटर (42% की वृद्धि) कर दिया गया है।
  • पेट्रोल की स्थिति: पेट्रोल पर निर्यात शुल्क में कोई बदलाव नहीं किया गया है और यह वर्तमान में शून्य बना हुआ है।
  • सरकार का उद्देश्य: वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इस संशोधन का लक्ष्य राजस्व बढ़ाना नहीं है, बल्कि निर्यातकों को वैश्विक और घरेलू कीमतों के अंतर का अनुचित लाभ उठाने से रोकना है।
  • घरेलू उपलब्धता: वित्त मंत्री के अनुसार, यह वृद्धि इसलिए आवश्यक है ताकि रिफाइनरियाँ घरेलू मांग और खपत को प्राथमिकता दें और देश के भीतर ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे।
  • बाजार की स्थिति: यह निर्णय तब लिया गया है जब कच्चा तेल $120 प्रति बैरल के उच्चतम स्तर से गिरकर $95-96 के आसपास गया है, किंतु शोधित उत्पादों की वैश्विक कीमतें अभी भी बहुत ऊंची हैं।


विंडफॉल टैक्स क्या है?

विंडफॉल टैक्स एक विशेष उच्च कर दर है जो उन उद्योगों या कंपनियों पर लगाया जाता है जिन्हें अचानक और अप्रत्याशित रूप से अत्यधिक लाभ प्राप्त होता है।

  • कारण: यह लाभ अक्सर कंपनी की अपनी कुशलता से नहीं, बल्कि बाहरी कारकों (जैसे युद्ध, आपूर्ति में कमी या वैश्विक मूल्य वृद्धि) के कारण होता है।
  • उद्देश्य: सरकार इस टैक्स का उपयोग आर्थिक विसंगतियों को कम करने और यह सुनिश्चित करने के लिए करती है कि कंपनियां घरेलू बाजार की अनदेखी कर केवल बाहरी लाभ के लिए निर्यात करें।


निष्कर्ष

सरकार द्वारा विंडफॉल टैक्स में किया गया यह संशोधन एक रणनीतिक कदम है, जो वैश्विक बाजार की अस्थिरता के बीच भारतीय उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करता है। निर्यात पर उच्च लेवी लगाकर सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया है कि निजी लाभ के ऊपर राष्ट्र की ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू आपूर्ति सर्वोपरि है। यह निर्णय केवल कीमतों को नियंत्रित करने में सहायक होगा, बल्कि देश के भीतर पेट्रोलियम उत्पादों के सुचारू वितरण को भी सुनिश्चित करेगा।

संदर्भ

हाल ही में भारत ने अंतरराष्ट्रीय एकजुटता और मानवीय सहायता के तहत अफगानिस्तान के सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्रालय को 13 टन बैसिल कैलमेट-गुएरिन (BCG) टीके और संबंधित चिकित्सा सामग्री की एक बड़ी खेप सौंपी है। यह कदम केवल पड़ोसी देशों के स्वास्थ्य ढांचे को सुदृढ़ करने की भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर 'वैक्सीन कूटनीति' के क्षेत्र में भारत के बढ़ते प्रभाव को भी रेखांकित करता है।


यह क्या है और कैसे कार्य करता है?

बैसिल कैलमेट-गुएरिन (BCG) तपेदिक (टीबी) के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करने वाला दुनिया का एकमात्र लाइसेंस प्राप्त टीका है।

  • प्रकृति: यह एक जीवित क्षीण टीका है। इसका अर्थ है कि इसमें बैक्टीरिया का एक कमजोर रूप उपयोग किया जाता है, जो शरीर में बीमारी पैदा नहीं करता बल्कि प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय करता है।
  • कार्यप्रणाली: जब यह टीका लगाया जाता है, तो यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को माइकोबैक्टीरियल प्रोटीन की पहचान करना सिखाता है। इसके परिणामस्वरूप शरीर में टी-कोशिकाओं और एंटीबॉडी का उत्पादन होता है, जो भविष्य में असली 'माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस' के आक्रमण पर तत्काल और प्रभावी रक्षा कवच प्रदान करते हैं।


टीके के प्रमुख घटक

BCG वैक्सीन की संरचना वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत सटीक होती है:

  • सक्रिय तत्व: इसमें माइकोबैक्टीरियम बोविस का कमजोर स्ट्रेन होता है।
  • स्थिरीकरण: इसकी क्षमता बनाए रखने के लिए इसमें ग्लिसरॉल, साइट्रिक एसिड और विभिन्न लवणों (सोडियम, पोटेशियम, मैग्नीशियम) का मिश्रण होता है।
  • स्वरूप: परिवहन की सुगमता और लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए इसे अक्सर फ्रीज-ड्राइड रूप में भेजा जाता है, जिसे उपयोग के समय विशेष मंदक के साथ पुनर्गठित किया जाता है।


प्रमुख विशेषताएँ

  • प्रशासन मार्ग: इसे आमतौर पर ऊपरी बाईं बांह में इंट्राडर्मली (त्वचा के भीतर) दिया जाता है।
  • पहचान चिह्न: इंजेक्शन के स्थान पर एक स्थायी सपाट निशान (BCG Scar) बनता है, जो सफल टीकाकरण का एक सामान्य संकेत है।
  • बहुउपयोगी प्रभाव: टीबी के अलावा, यह कुष्ठ रोग के विरुद्ध भी सुरक्षा देता है और मूत्राशय के कैंसर के उपचार में 'इम्यूनोथेरेपी' के रूप में प्रयोग किया जाता है।


महत्व

  • शिशु मृत्यु दर में कमी: यह बच्चों में टीबी मेनिनजाइटिस जैसे प्राणघातक रूपों के विरुद्ध 70-80% सुरक्षा प्रदान करता है।
  • वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा: टीबी की उच्च व्यापकता वाले देशों में यह सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों की आधारशिला है।
  • वैक्सीन कूटनीति: भारत द्वारा ऐसी महत्वपूर्ण दवाओं की आपूर्ति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच को सुलभ बनाने में मील का पत्थर सिद्ध होती है।


निष्कर्ष

BCG वैक्सीन केवल तपेदिक के विरुद्ध एक वैज्ञानिक ढाल है, बल्कि यह विकासशील देशों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य का एक अनिवार्य स्तंभ भी है। भारत द्वारा अफगानिस्तान को भेजी गई यह सहायता वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों के प्रति संवेदनशीलता और 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना का जीवंत उदाहरण है। टीबी मुक्त विश्व की दिशा में यह निरंतर प्रयास मानवता के उज्जवल भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

जैसे-जैसे वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है, भारत के लिए 'लू' अब केवल एक मौसमी असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर जन-स्वास्थ्य और आर्थिक आपदा बन गई है। जलवायु परिवर्तन के कारण भारत का एक बड़ा भू-भाग तीव्र ऊष्मीय तनाव का सामना कर रहा है। विडंबना यह है कि जहाँ आपदाएं तकनीकी रूप से विकसित हो रही हैं, वहीं हमारा कानूनी ढांचा अब भी पुराने मानदंडों पर टिका है, जिससे देश का एक विशाल कार्यबल असुरक्षित हो गया है।


भारत के ग्रीष्म संकट में विधायी शून्यता

'विधायी शून्यता' का अर्थ उस कानूनी रिक्तता से है जहाँ हमारे पास अत्यधिक गर्मी से निपटने के लिए कोई बाध्यकारी या प्रवर्तनीय कानून उपलब्ध नहीं हैं।

  • वर्तमान में, लू से सुरक्षा को नियोक्ताओं या सरकारों के विवेक पर छोड़ दिया गया है।
  • इसे संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार) के तहत एक अनिवार्य सुरक्षा मानक के रूप में अभी तक संहिताबद्ध नहीं किया गया है।
  • यह शून्यता विशेष रूप से उन 490 मिलियन श्रमिकों को प्रभावित करती है जो खुले आसमान के नीचे काम करते हैं।


चर्चा में क्यों है?

हालिया शोध और रिपोर्टों ने इस मुद्दे को केंद्र में ला दिया है क्योंकि:

  • कार्यबल का बहिष्करण: भारत के लगभग 57% जिले अब लू-प्रवण हैं, लेकिन यहाँ के बाहरी श्रमिकों के लिए कोई सुरक्षा कानून नहीं है।
  • अधिकारों का संघर्ष: गर्मी से सुरक्षा को 'परामर्श' माना जा रहा है, कि 'अधिकार'
  • श्रम संहिताओं में कमी: नई श्रम संहिताओं (2020) में भी बाहरी ऊष्मीय तनाव को अनिवार्य सुरक्षा मानदंडों में शामिल नहीं किया गया है।


भारत में बढ़ती लू के कारण

  • वैश्विक जलवायु परिवर्तन: वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि से गर्मी की लहरों की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ी है।
  • अर्बन हीट आइलैंड (UHI): शहरों में कंक्रीट और डामर की अधिकता गर्मी को सोख लेती है, जिससे शहरी क्षेत्र ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक गर्म हो जाते हैं।
  • आर्द्रता और ऊष्मा का घातक मिश्रण: तटीय क्षेत्रों में उच्च तापमान और नमी मिलकर 'वेट-बल्ब तापमान' को बढ़ा देते हैं, जो मानव शरीर के लिए जानलेवा है।
  • वायुमंडलीय बदलाव: जेट स्ट्रीम और हीट डोम जैसी स्थितियां भारत के उत्तर और मध्य भागों में गर्मी को लंबे समय तक रोक कर रखती हैं।
  • पारिस्थितिक क्षरण: वनों की कटाई और प्राकृतिक जल निकायों के विनाश से प्राकृतिक शीतलन तंत्र समाप्त हो गया है।


भारत में लू पर डेटा और सांख्यिकी

  • भौगोलिक विस्तार: 57% से अधिक भारतीय जिले अब लू के प्रति संवेदनशील हैं।
  • अनौपचारिक क्षेत्र: 400 से 490 मिलियन लोग (निर्माण, सड़क विक्रेता, गिग वर्कर्स) बिना किसी 'शीतलन स्वायत्तता' के कार्य कर रहे हैं।
  • सूक्ष्म-जलवायु का खतरा: कचरा चुनने वाले स्वच्छता कर्मचारी जहरीली गैसों के कारण सामान्य से 5% अधिक तापमान का सामना करते हैं।
  • आर्थिक प्रभाव: अत्यधिक गर्मी के कारण उत्पादकता में भारी गिरावट रही है, जिससे भारत की जीडीपी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है।

कानूनों में मौजूदा शून्यता

  • कारखाना अधिनियम (1948): यह केवल बंद परिसरों में काम करने वालों की बात करता है; बाहरी श्रमिकों को पूरी तरह नजरअंदाज करता है।
  • OSHWC कोड 2020: यह नई संहिता बाहरी गर्मी को अनिवार्य सुरक्षा चिंता के रूप में दर्ज करने में विफल रही है।
  • धारा 23 का विवेकाधीन स्वरूप: यह सरकार को मानक बनाने की शक्ति तो देता है, लेकिन उन्हें 'अनिवार्य' नहीं बनाता।
  • 10% की वित्तीय सीमा: लू 'राष्ट्रीय अधिसूचित आपदा' नहीं है, इसलिए राज्य अपने आपदा कोष (SDRF) का केवल 10% ही इस पर खर्च कर सकते हैं, जो अपर्याप्त है।
  • गिग वर्कर्स का कानूनी दर्जा: डिलीवरी पार्टनर्स को 'पार्टनर' माना जाता है, जिससे वे श्रमिक सुरक्षा कानूनों के दायरे से बाहर हो जाते हैं।


NDMA के दिशानिर्देश

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं:

  • हीट एक्शन प्लान (HAPs): स्थानीय स्तर पर कार्ययोजना बनाना।
  • प्रारंभिक चेतावनी: येलो, ऑरेंज और रेड अलर्ट के माध्यम से जनता को सूचित करना।
  • सार्वजनिक सुविधाएं: ठंडी छतें, पेयजल केंद्र और छायादार आश्रयों का निर्माण।
  • कार्य समय में बदलाव: दोपहर 12 से 4 बजे के बीच बाहरी कार्यों को प्रतिबंधित या सीमित करना।
  • विभागीय समन्वय: स्वास्थ्य, परिवहन और स्थानीय निकायों के बीच तालमेल बिठाना।


विश्लेषण

भारत में गर्मी का संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि 'सामाजिक-आर्थिक अन्याय' का विषय है। एक ओर जहाँ संपन्न वर्ग एयर-कंडीशनिंग के माध्यम से सुरक्षित है, वहीं दूसरी ओर देश की अर्थव्यवस्था को गति देने वाला श्रमिक वर्ग 'थर्मल इंजस्टिस' का शिकार है। कानून का अभाव इस संकट को और गहराता है। जब तक लू को 'अधिकार-आधारित' चश्मे से नहीं देखा जाएगा, तब तक राहत कार्य केवल कागजी परामर्शों तक सीमित रहेंगे। यह 'जलवायु-जाति गठजोड़' को दर्शाता है, जहाँ सबसे गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोग सबसे घातक जलवायु प्रहार झेलते हैं।


आगे की राह

  • राष्ट्रीय आपदा की घोषणा: लू को 2026-31 की अवधि के लिए 'राष्ट्रीय अधिसूचित आपदा' घोषित किया जाए।
  • हीट इंडेक्स का उपयोग: केवल तापमान नहीं, बल्कि आर्द्रता को मिलाकर 'हीट इंडेक्स' को सुरक्षा का कानूनी पैमाना बनाया जाए।
  • बाध्यकारी मानक: OSHWC कोड के तहत अनिवार्य 'कार्य-विश्राम चक्र' अधिसूचित किए जाएं।
  • संवैधानिक अधिकार: 'शीतलन के अधिकार' को अनुच्छेद 21 का हिस्सा माना जाए।
  • बीमा सुरक्षा: अनौपचारिक श्रमिकों के लिए 'पैरामीट्रिक हीट इंश्योरेंस' शुरू किया जाए ताकि कमाई होने वाले दिनों में उन्हें वित्तीय सहायता मिल सके।


निष्कर्ष

भारत में बढ़ता ग्रीष्म संकट एक मूक हत्यारा है जो हमारे कार्यबल की नींव को कमजोर कर रहा है। इस विधायी शून्यता को भरना अब वैकल्पिक नहीं बल्कि अनिवार्य है। सरकार को परामर्शों से आगे बढ़कर ठोस कानूनी प्रावधानों की ओर बढ़ना होगा। थर्मल सुरक्षा को मौलिक अधिकार मानकर ही हम अपने नागरिकों को एक न्यायपूर्ण और सुरक्षित भविष्य दे सकते हैं। यह समय 'सामाजिक अनुबंध' को जलवायु परिवर्तन की वास्तविकताओं के अनुरूप ढालने का है।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

संदर्भ

भारतीय लोकतंत्र की नींव 'एक व्यक्ति, एक वोट और एक मूल्य' के सिद्धांत पर टिकी है अर्थात भारत में लोकसभा सीटों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर होता है, किंतु भाषाई और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए 1976 के बाद से सीटों की संख्या को स्थिर कर दिया गया था। पिछले कई दशकों से उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच जनसंख्या नियंत्रण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर एक गंभीर विवाद चला रहा है, जो 2026 में परिसीमन पर लगी रोक हटने के साथ अब निर्णायक मोड़ पर है।


परिसीमन क्या है?

परिसीमन का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय वाले क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करने की प्रक्रिया।

  • संवैधानिक आधार: संविधान का अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद एक 'परिसीमन अधिनियम' लागू करने का अधिकार देता है। वहीं, अनुच्छेद 170 राज्यों के भीतर विधानसभा क्षेत्रों के विभाजन का आधार प्रदान करता है।
  • परिसीमन आयोग: परिसीमन का कार्य एक स्वतंत्र 'परिसीमन आयोग' द्वारा किया जाता है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। इसमें सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्यों के चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं।
  • शक्ति: इस आयोग के आदेशों को कानून के समान शक्ति प्राप्त होती है, परिसीमन आयोग के आदेशों को सामान्यतः न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती.


चर्चा का कारण

संसद में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 और परिसीमन विधेयक 2026 पर चर्चा के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए:

  • नारी शक्ति वंदन अधिनियम: महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रावधान 2026 के बाद होने वाली जनगणना और परिसीमन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है।
  • 1971 का फ्रीज: 1971 में सीटों को फ्रीज किया गया था, जिसके कारण 1976 से 2026 तक देश की जनता जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व से वंचित रही।
  • जाति जनगणना: सरकार ने स्पष्ट किया है कि 2026 की जनगणना जाति आधारित होगी, जिससे सामाजिक न्याय और सटीक डेटा सुनिश्चित हो सकेगा।


सीटों का गणित: 1971 से 2026 तक

  • 1971 का आधार: वर्तमान लोकसभा सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना पर आधारित है।
  • 42वां संशोधन (1976): जनसंख्या नियंत्रण प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए 2000 तक सीटों के पुनर्गठन पर रोक लगा दी गई।
  • 84वां संशोधन (2001): इस रोक को अगले 25 वर्षों यानी 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया।
  • वर्तमान स्थिति: वर्तमान में लोकसभा में 543 सीटें हैं। यदि 2021-26 के संभावित जनसंख्या आंकड़ों पर परिसीमन होता है, तो यह संख्या बढ़कर 800 से अधिक हो सकती है।


नए परिसीमन अधिनियम के प्रावधान और आवश्यकता

नया परिसीमन केवल सीमाओं का पुनर्निर्धारण नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सशक्तिकरण का एक माध्यम है:

  • नारी शक्ति वंदन अधिनियम: महिलाओं को 33% आरक्षण देने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की नई पहचान और रोटेशन आवश्यक है, जो परिसीमन के बिना संभव नहीं है।
  • लोकतांत्रिक संतुलन: जनसंख्या और मतदाता संख्या में भारी वृद्धि के कारण एक सांसद पर कार्यभार अत्यधिक बढ़ गया है, जिसे कम करने के लिए सीटों में वृद्धि अनिवार्य है।
  • प्रभाव: इसके माध्यम से निर्वाचन क्षेत्रों का आकार छोटा होगा, जिससे शासन और विकास कार्यों की निगरानी बेहतर हो सकेगी।


उत्तर-दक्षिण विवाद: प्रमुख चिंताएं और चुनौतियां

परिसीमन के मार्ग में कुछ अत्यंत संवेदनशील मुद्दे हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता:

  • उत्तर-दक्षिण असंतुलन: दक्षिण भारतीय राज्यों (तमिलनाडु, केरल आदि) ने शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश कर जनसंख्या वृद्धि दर को कम किया है।
    • आशंका है कि केवल 'जनसंख्या' को आधार बनाने पर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की सीटें बढ़ेंगी, जबकि बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों का राष्ट्रीय राजनीति में वजन कम हो जाएगा।
  • संघवाद पर प्रहार: यदि कुछ राज्यों को उनकी सफलता की सजा 'कम राजनीतिक शक्ति' के रूप में मिलती है, तो यह 'सहकारी संघवाद' की भावना के खिलाफ होगा।
  • राजकोषीय प्रभाव: वित्त आयोग द्वारा फंड का आवंटन भी अक्सर जनसंख्या पर आधारित होता है। परिसीमन के बाद वित्तीय संसाधनों का वितरण भी उत्तर की ओर झुक सकता है।


उत्तर-दक्षिण नैरेटिव और 'प्रो-रेटा' संतुलन

  • आनुपातिक हिस्सेदारी: सरकार ने स्पष्ट किया है कि दक्षिण के 5 राज्यों (कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल) की वर्तमान हिस्सेदारी 23.76% है।
  • परिसीमन के बाद: 50% वृद्धि के साथ इन राज्यों की सीटें 129 से बढ़कर 195 हो जाएंगी। कुल 816 सीटों में उनकी हिस्सेदारी 23.87% होगी।


संवैधानिक प्रावधान और सामाजिक न्याय

  • SC/ST आरक्षण: परिसीमन की प्रक्रिया से ही अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या उनकी बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप बढ़ाई जा सकेगी।
  • धर्म आधारित आरक्षण का निषेध: भारतीय संविधान जन्म के आधार पर आरक्षण स्वीकार करता है, धर्म के आधार पर नहीं। परिसीमन प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक सिद्धांतों और पंथनिरपेक्ष ढांचे के भीतर होगी।


समग्र परिदृश्य पर संवैधानिक प्रावधान

  • संविधान का अनुच्छेद 81 यह सुनिश्चित करता है कि लोकसभा सीटों का राज्यों को आवंटन इस प्रकार हो कि सीटों की संख्या और जनसंख्या का अनुपात पूरे देश में (जहाँ तक संभव हो) समान रहे। 2026 के बाद इस 'समानता' को पुनः स्थापित करना एक संवैधानिक बाध्यता है।


विश्लेषण

परिसीमन का मुद्दा केवल गणितीय नहीं, बल्कि संघवाद की परीक्षा है।

  • संघीय संतुलन: परिसीमन केवल संख्या का खेल नहीं है, बल्कि यह केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के संतुलन और 'सहकारी संघवाद' को मजबूत करने का माध्यम है।
  • प्रतिनिधित्व का संकट: यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाया गया, तो दक्षिण भारत का राजनीतिक प्रभाव कम हो जाएगा, जिससे क्षेत्रीय असंतोष पनप सकता है।
  • संवैधानिक नैतिकता: क्या विकास और सुशासन (जनसंख्या नियंत्रण) की कीमत राजनीतिक हाशिए पर जाकर चुकानी होगी? यह एक बड़ा नैतिक प्रश्न है।
  • राजकोषीय प्रभाव: वित्त आयोग द्वारा फंड का आवंटन भी अक्सर जनसंख्या पर आधारित होता है। परिसीमन का प्रभाव भविष्य के वित्त हस्तांतरण पर भी पड़ सकता है।


आगे की राह

  • समावेशी फॉर्मूला: सरकार को एक ऐसा 'वेटेज फॉर्मूला' अपनाना चाहिए जिसमें जनसंख्या के साथ-साथ विकास सूचकांकों (HDI) और जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को भी महत्व दिया जाए।
  • राज्य परिषद (राज्यसभा) का सुदृढ़ीकरण: राज्यों के हितों की रक्षा के लिए राज्यसभा में सीटों के वितरण पर पुनर्विचार किया जा सकता है।
  • आम सहमति: परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करने से पहले सभी राज्यों के साथ व्यापक राजनीतिक संवाद आवश्यक है ताकि इसे 'उत्तर बनाम दक्षिण' का मुद्दा बनने से रोका जा सके।


निष्कर्ष

भारत का आगामी परिसीमन लोकतंत्र के महाकुंभ जैसा है। यह केवल सीटों की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि भारत की बदलती जनसांख्यिकी और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के बीच संतुलन साधने का प्रयास है। यदि इसे पारदर्शिता, निष्पक्षता और 'सहकारी संघवाद' की भावना के साथ क्रियान्वित किया जाता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र को और अधिक समावेशी और सशक्त बनाएगा

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1 भारतीय विरासत और संस्कृति, विश्व का इतिहास एवं भूगोल और समाज।

संदर्भ:

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में नीति-निर्धारण के स्तर पर महिलाओं की भागीदारी सदैव एक चिंता का विषय रही है। स्वतंत्रता के पश्चात से ही संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अत्यंत न्यून रहा। यद्यपि 73वें और 74वें संविधान संशोधन (1992) ने पंचायती राज संस्थाओं और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया, जिससे जमीनी स्तर पर नेतृत्व का उदय हुआ, किंतु राज्य विधानसभाओं और लोक सभा में उनकी उपस्थिति लंबे समय तक प्रतीक्षित रही। हाल ही में पारित 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023' और 2026 में प्रस्तावित परिसीमन विधेयक इस दिशा में एक क्रांतिकारी कदम हैं।


महिला सशक्तिकरण: विधिक एवं प्रामाणिक आधार

  • विधिक दृष्टिकोण से महिला सशक्तिकरण केवल एक सामाजिक सुधार नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अधिकार है।
  • संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार, सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाओं में आत्म-मूल्य की भावना, उनके पास विकल्पों को चुनने का अधिकार और समाज में बदलाव लाने हेतु संसाधनों तक उनकी पहुँच।
  • भारत में यह सशक्तिकरण अब 'कल्याणकारी दृष्टिकोण' से बदलकर 'अधिकार-आधारित दृष्टिकोण' की ओर अग्रसर है।


33% आरक्षण का महत्त्व एवं प्रभाव

लोक सभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली, जम्मू-कश्मीर तथा पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में 33% आरक्षण का प्रावधान भारतीय लोकतंत्र के ढांचे को बदल देगा:

  • नीति-निर्माण में संवेदनशीलता: स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण जैसे विषयों पर अधिक व्यावहारिक नीतियां बनेंगी।
  • नेतृत्व का लोकतंत्रीकरण: राजनीति में वंशवाद और पुरुष वर्चस्व को चुनौती मिलेगी।
  • परिसीमन का प्रभाव: सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 850 होने पर, आरक्षित सीटों की वास्तविक संख्या में बड़ी वृद्धि होगी, जो अधिक महिलाओं को मुख्यधारा में लाएगी।


भारत में महिलाओं की वर्तमान राजनीतिक स्थिति

  • वर्तमान में (2024-26 के आंकड़ों के अनुसार), लोक सभा में महिलाओं की संख्या कुल सदस्यों का लगभग 14-15% है।
  • यद्यपि यह संख्या पिछले दशकों की तुलना में बेहतर है, फिर भी यह वैश्विक औसत और भारत की महिला जनसंख्या के अनुपात में काफी कम है।
  • विधानसभाओं में तो कई राज्यों में यह आंकड़ा 10% से भी कम है।


वैश्विक परिदृश्य: प्रामाणिक रिपोर्टों के अनुसार

  • IPU (Inter-Parliamentary Union): रिपोर्ट के अनुसार, रवांडा (61%), क्यूबा (53%) और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश महिला प्रतिनिधित्व में अग्रणी हैं।
  • Global Gender Gap Report (WEF): भारत राजनीतिक सशक्तिकरण के सूचकांक में अपनी स्थिति सुधारने के लिए संघर्ष कर रहा है। वैश्विक स्तर पर औसत महिला प्रतिनिधित्व लगभग 26.5% है, जिसे प्राप्त करने हेतु भारत का नया आरक्षण विधेयक मील का पत्थर साबित होगा।


महिला सशक्तिकरण हेतु सरकार के अन्य प्रयास

सरकार ने केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण हेतु भी कदम उठाए हैं:

  • बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ: लिंग अनुपात में सुधार और शिक्षा को बढ़ावा।
  • प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना: स्वास्थ्य और स्वच्छ ईंधन तक पहुँच।
  • मुद्रा योजना: महिला उद्यमियों को वित्तीय सहायता (लगभग 70% ऋण प्राप्तकर्ता महिलाएं हैं)
  • मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम: कामकाजी महिलाओं के लिए सवैतनिक अवकाश में वृद्धि।


संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान महिलाओं को सशक्त करने हेतु दृढ़ आधार प्रदान करता है:

  • अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता।
  • अनुच्छेद 15(3): राज्य को महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान करने की शक्ति।
  • अनुच्छेद 39(a): पुरुषों और महिलाओं को समान रूप से आजीविका के पर्याप्त साधन का अधिकार।
  • अनुच्छेद 42: प्रसूति सहायता के लिए प्रावधान।


विश्लेषण

महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना एक रणनीतिक निर्णय है। जहाँ एक ओर यह जनसंख्या के नए आंकड़ों के आधार पर न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है, वहीं दूसरी ओर इसमें होने वाला विलंब एक चुनौती भी है। आरक्षण से 'प्रतीकात्मक नेतृत्व' का खतरा तो रहता है, किंतु पंचायती राज के अनुभवों ने सिद्ध किया है कि अवसर मिलने पर महिलाएं अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवाती हैं।


आगे की राह

  • क्षमता निर्माण: निर्वाचित होने वाली महिलाओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।
  • पार्टी के भीतर सुधार: राजनीतिक दलों को स्वेच्छा से अधिक महिला उम्मीदवारों को टिकट देना चाहिए।
  • सामाजिक चेतना: पितृसत्तात्मक सोच को बदलने हेतु जमीनी स्तर पर शिक्षा और जागरूकता आवश्यक है।


निष्कर्ष

महिला आरक्षण विधेयक केवल एक वैधानिक दस्तावेज नहीं, बल्कि आधी आबादी की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है। 33% आरक्षण और परिसीमन के माध्यम से सीटों में वृद्धि भारत को एक समावेशी लोकतंत्र की ओर ले जाएगी। जब संसद की संरचना बदलेगी, तभी देश की नियति में महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित होगी। यह 'नारी शक्ति' से 'राष्ट्र शक्ति' के निर्माण का मार्ग है।