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सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन


संदर्भ

ऊर्जा सुरक्षा किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता और आर्थिक प्रगति का आधार स्तंभ होती है। भारत की बढ़ती जनसंख्या और औद्योगिक विस्तार के बीच, परमाणु ऊर्जा एक ऐसे स्वच्छ एवं विश्वसनीय विकल्प के रूप में उभरी है जो विकास और पर्यावरण संरक्षण के मध्य संतुलन स्थापित करने में सक्षम है।

परमाणु ऊर्जा:

परमाणु ऊर्जा, परमाणु के नाभिक के विखंडन से उत्पन्न होने वाली वह शक्ति है, जो न्यूनतम ईंधन में विशाल ऊर्जा प्रदान करती है। यह 'बेसलोड' बिजली का एक प्रमुख स्रोत है, जो सौर और पवन ऊर्जा की तरह रुक-रुक कर नहीं, बल्कि निरंतर विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करती है।

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन के विश्लेषण और 'शांति अधिनियम 2025' के प्रस्ताव ने परमाणु क्षेत्र में निजी निवेश के द्वार खोल दिए हैं।
  • भारत द्वारा अपनी परमाणु क्षमता को 2047 तक 100 GW तक पहुँचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य इस विषय को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ले आया है।

भारत को परमाणु ऊर्जा की आवश्यकता क्यों?

भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग और वैश्विक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए परमाणु ऊर्जा अपरिहार्य है:

  • विकसित भारत @2047: भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए प्रति व्यक्ति बिजली खपत में भारी वृद्धि आवश्यक है।
  • नेट-जीरो लक्ष्य 2070: जीवाश्म ईंधन (कोयला) पर निर्भरता कम कर शून्य उत्सर्जन की प्राप्ति के लिए परमाणु ऊर्जा एकमात्र स्थायी विकल्प है।
  • वैश्विक तुलना और मांग (सांख्यिकी):
    • भारत की प्रति व्यक्ति खपत: वर्तमान में मात्र 1,418 kWh है।
    • चीन: 7,097 kWh
    • संयुक्त राज्य अमेरिका: 12,701 kWh
    • भारत की स्थिति: वैश्विक औसत का केवल 1/5 हिस्सा।
  • वर्तमान उत्पादन स्थिति: जून 2025 तक भारत की कुल क्षमता 476 GW है, जिसमें थर्मल पावर का हिस्सा 75% है, जबकि परमाणु ऊर्जा केवल 3% (8.8 GW) का योगदान दे रही है।

भारत का त्रि-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम

डॉ. होमी जहांगीर भाभा द्वारा परिकल्पित यह कार्यक्रम भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की कुंजी है:

  • प्रथम चरण: प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर्स (PHWRs) - प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग।
  • द्वितीय चरण: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स (FBR) - प्लूटोनियम का उपयोग (जैसे कलपक्कम में PFBR)
  • तृतीय चरण: थोरियम आधारित रिएक्टर्स - भारत के विशाल थोरियम भंडार का उपयोग कर दीर्घकालिक सुरक्षा।

भारत की परमाणु ऊर्जा यात्रा

स्वदेशी तकनीक के विकास से लेकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग तक, भारत ने लंबी दूरी तय की है। आज भारत ने 220 MW, 540 MW और 700 MW के स्वदेशी रिएक्टर विकसित किए हैं, जिनकी लागत वैश्विक स्तर पर सबसे किफायती मानी जाती है। अब भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, जो कम पूंजी और कम समय में तैयार किए जा सकते हैं।

सरकारी पहल: शांति (SHANTI) योजना एवं अन्य

सरकार ने इस क्षेत्र को आधुनिक बनाने के लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाए हैं:

  • शांति योजना (2025): यह अधिनियम निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित करता है और विनियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाता है।
  • विदेशी निवेश: विदेशी निवेश के लिए नियमों को उदार बनाना ताकि वैश्विक तकनीक का लाभ उठाया जा सके।
  • संसाधन आवंटन: थोरियम के दोहन के लिए अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश बढ़ाना।

प्रमुख चुनौतियां एवं चिंताएं

महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के मार्ग में कुछ गंभीर बाधाएं भी हैं:

  • अत्यधिक पूंजी: 100 GW के लक्ष्य के लिए लगभग $200 बिलियन (₹18 लाख करोड़) के भारी निवेश की आवश्यकता है।
  • लंबी निर्माण अवधि: परमाणु परियोजनाओं को पूर्ण होने में वर्षों का समय लगता है, जिससे लागत बढ़ जाती है।
  • नियामक जटिलताएं: कड़े सुरक्षा मानक और अंतरराष्ट्रीय संधियां प्रक्रिया को धीमा करती हैं।
  • जन सुरक्षा और धारणा: फुकुशिमा जैसी घटनाओं के बाद सुरक्षा को लेकर जनता के मन में व्याप्त संशय एक बड़ी चुनौती है।

सर्वश्रेष्ठ विश्लेषण

भारत की ऊर्जा नीति वर्तमान में एक संक्रमण काल से गुजर रही है। केवल सौर और पवन ऊर्जा पर निर्भर रहना औद्योगिक विकास के लिए पर्याप्त नहीं है क्योंकि उनकी प्रकृति अस्थिर है। परमाणु ऊर्जा वह 'मजबूत आधार' प्रदान करती है जो भारत को एक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए आवश्यक है। 'शांति अधिनियम' के माध्यम से निजी क्षेत्र का समावेश इस क्षेत्र में व्याप्त 'सरकारी एकाधिकार' और 'पूंजी की कमी' को दूर करने का एक साहसिक प्रयास है।

आगे की राह

  • संवर्धित वित्तपोषण और निवेश: परमाणु ऊर्जा को 'ग्रीन फाइनेंस' के दायरे में लाकर कम ब्याज दर पर ऋण सुनिश्चित करना तथा ग्रीन बॉन्ड सॉवरेन वेल्थ फंड के माध्यम से निवेश के नए रास्ते खोलना।
  • SMR और निजी सहभागिता: बड़े संयंत्रों के स्थान पर स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMR) को प्राथमिकता देना और निजी उद्योगों को अपने स्वयं के 'कैप्टिव' परमाणु संयंत्र लगाने के लिए प्रोत्साहित करना।
  • नियामक सुदृढ़ीकरण: परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को अधिक स्वायत्त, पारदर्शी और तकनीकी रूप से सक्षम बनाकर नियामक ढांचे में सुधार करना।
  • स्वदेशीकरण और थोरियम मिशन: भारत के त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के तहत थोरियम आधारित तीसरे चरण को शीघ्रता से क्रियान्वित कर आत्मनिर्भरता हासिल करना।
  • मानव संसाधन और जन-विश्वास: विशेष अकादमियों के माध्यम से कुशल इंजीनियरों की कमी को दूर करना और व्यापक जागरूकता अभियानों द्वारा सुरक्षा के प्रति सार्वजनिक विश्वास बढ़ाना।

निष्कर्ष

भारत के लिए परमाणु ऊर्जा केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता है। 2047 के 'विकसित भारत' के स्वप्न को साकार करने और 2070 के 'नेट-जीरो' संकल्प को सिद्ध करने के लिए परमाणु ऊर्जा का विस्तार अपरिहार्य है। यदि हम वित्तीय और नियामक बाधाओं को समय पर दूर कर लेते हैं, तो भारत निश्चित रूप से वैश्विक ऊर्जा मानचित्र पर एक अग्रणी शक्ति के रूप में स्थापित होगा।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन


संदर्भ

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अपनी स्थापना के बाद के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। जहाँ एक ओर नियम-आधारित व्यवस्था पर आधारित बहुपक्षवाद कमजोर हो रहा है, वहीं दूसरी ओर WTO जैसे संस्थानों की प्रासंगिकता पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। संप्रभुता के संघर्ष और व्यापारिक युद्धों के बीच WTO की वर्तमान स्थिति अंतरराष्ट्रीय सहयोग के भविष्य को लेकर एक अनिश्चितता पैदा करती है।

विश्व व्यापार संगठन (WTO)

विश्व व्यापार संगठन एकमात्र वैश्विक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो राष्ट्रों के बीच व्यापार के नियमों से निपटता है। इसका मुख्य उद्देश्य व्यापार को यथासंभव सुचारू रूप से, स्वतंत्र रूप से और अनुमानित रूप से चलाने में मदद करना है।

  • स्थापना और इतिहास
  • स्थापना: 1 जनवरी, 1995 को मराकेश समझौते के तहत की गई थी।
  • पूर्ववर्ती: इसने 1948 से चले रहे GATT (टैरिफ और व्यापार पर सामान्य समझौता) का स्थान लिया।
  • मुख्यालय: जिनेवा, स्विट्जरलैंड।
  • संरचना और सदस्यता
  • सदस्य: वर्तमान में इसमें 166 सदस्य शामिल हैं, जो वैश्विक व्यापार के 98% से अधिक का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • सर्वोच्च निकाय: मंत्रिस्तरीय सम्मेलन इसकी सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है, जिसकी बैठक आमतौर पर हर दो साल में होती है।
  • निर्णय प्रक्रिया: यहाँ सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं, जिसका अर्थ है कि हर सदस्य के पास 'वीटो' की शक्ति होती है।

चर्चा में क्यों?

WTO हाल ही में याउंडे, कैमरून (मार्च 2026) में आयोजित अपने 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) के कारण चर्चा में है।

  • अधिसंयोजन का अंत: -कॉमर्स (इलेक्ट्रॉनिक प्रसारण) पर सीमा शुल्क लगाने का 1998 से चला रहा प्रतिबंध 30 मार्च 2026 को समाप्त हो गया, क्योंकि सदस्य देशों के बीच इसे बढ़ाने पर सहमति नहीं बन पाई।
  • विवाद निपटान तंत्र का ठप होना: 2019 से अपीलीय निकाय  निष्क्रिय है, जिससे व्यापार नियमों का प्रवर्तन असंभव हो गया है।
  • MC14 की विफलता: कृषि सब्सिडी और मत्स्य पालन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर किसी ठोस समझौते तक पहुँचने में असमर्थता।

वर्तमान प्रासंगिकता एवं मुख्य चुनौतियां

WTO के सामने आज 'अस्तित्व का संकट' है, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • सर्वसम्मति आधारित निर्णय: 166 देशों के बीच सर्वसम्मति की आवश्यकता अक्सर 'वीटो' जैसी स्थिति पैदा कर देती है, जिससे निर्णय प्रक्रिया पंगु हो गई है।
  • अमेरिका-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा: अमेरिका द्वारा एकपक्षीय टैरिफ और चीन द्वारा सब्सिडी आधारित औद्योगिक नीति ने WTO के समतावादी सिद्धांतों को गहरी चोट पहुँचाई है।
  • अपीलीय निकाय का संकट: अमेरिका द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति पर रोक लगाने से विवाद निपटान प्रणाली पूरी तरह पंगु हो गई है, जिससे देश अब अपनी मर्जी से व्यापारिक प्रतिबंध लगाने को स्वतंत्र महसूस कर रहे हैं।

सर्वाधिक पसंदीदा राष्ट्र (MFN) सिद्धांत पर प्रश्न

'मोस्ट फेवर्ड नेशन' (MFN) सिद्धांत का अर्थ है कि यदि एक सदस्य किसी देश को व्यापारिक लाभ देता है, तो वह अन्य सभी सदस्यों को भी मिलना चाहिए।

  • चुनौती: रूस-यूक्रेन संघर्ष और अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के बाद, कई देशों ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए कतिपय देशों से MFN दर्जा वापस लेना शुरू कर दिया है। यह नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था के मूल सिद्धांत पर सीधा प्रहार है।

अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे: बहुपक्षीय बनाम बहुपक्षीय

  • विकास हेतु निवेश सुविधा समझौता (IFD): 120 से अधिक देशों ने इस पर सहमति जताई, लेकिन भारत ने इसे WTO के मूल ढांचे के खिलाफ बताते हुए विरोध किया।
  • डिजिटल विभाजन: विकसित देश स्थायी डिजिटल व्यापार छूट चाहते हैं, जबकि विकासशील देश राजस्व हानि के डर से इसका विरोध कर रहे हैं।

भारत और WTO

भारत WTO के भीतर विकासशील देशों की सशक्त आवाज रहा है।

  • खाद्य सुरक्षा: भारत 'सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग' (PSH) के लिए स्थायी समाधान की मांग कर रहा है ताकि वह अपने किसानों को समर्थन दे सके।
  • मत्स्य पालन सब्सिडी: भारत का रुख स्पष्ट है कि विकसित देशों के बड़े औद्योगिक बेड़े को मिलने वाली सब्सिडी पर रोक लगनी चाहिए, कि गरीब मछुआरों की सहायता पर।
  • सुधारों का समर्थन: भारत विवाद निपटान तंत्र की तत्काल बहाली और समावेशी सुधारों का पक्षधर है।

विश्लेषण

WTO की विफलता का अर्थ केवल व्यापारिक घाटा नहीं, बल्कि वैश्विक 'शक्ति संतुलन' का बिगड़ना है। वर्तमान में देश WTO के स्थान पर क्षेत्रीय व्यापार समझौतों (RTAs) की ओर झुक रहे हैं। यह 'डी-ग्लोबलाइजेशन' की ओर एक कदम है, जो छोटे और विकासशील देशों को बड़ी शक्तियों के आर्थिक दबाव के प्रति संवेदनशील बनाता है।

आगे की राह

  • विवाद निपटान की बहाली: 2026 के अंत तक अपीलीय निकाय को कार्यात्मक बनाना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
  • निर्णय प्रक्रिया में सुधार: 'पूर्ण सर्वसम्मति' के स्थान पर 'बहुमत' या 'महत्वपूर्ण सर्वसम्मति' जैसे विकल्पों पर विचार करना होगा।
  • विकासशील देशों के हितों की सुरक्षा: कृषि और विकास के मुद्दों को दरकिनार कर नई तकनीकों पर चर्चा करना ट्रस्ट डेफिसिट को बढ़ाएगा।

निष्कर्ष

विश्व व्यापार संगठन आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ उसे या तो खुद को सुधारना होगा या अप्रासंगिकता के गर्त में गिरना होगा। एक नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के बिना विश्व व्यापार 'जंगल राज' में तब्दील हो जाएगा, जहाँ केवल शक्तिशाली देशों के हितों की रक्षा होगी। अतः WTO का पुनरुद्धार केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि एक नैतिक आवश्यकता भी है।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

प्लास्टिक प्रदूषण वर्तमान वैश्विक पर्यावरणीय संकटों में सबसे जटिल है। भारत ने 2016 में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम लागू किए थे, जिनका उद्देश्य प्लास्टिक के उत्पादन से लेकर उसके निपटान तक की जवाबदेही तय करना था। हाल ही में 31 मार्च को घोषित इन नियमों के नवीनतम संस्करण और 2026 के आगामी संशोधन इस नीतिगत ढांचे के निरंतर विकास और इसमें व्याप्त गंभीर चुनौतियों को रेखांकित करते हैं।

प्लास्टिक की सर्वव्यापकता और नीतिगत अंतर्विरोध

प्लास्टिक का उपयोग आज हमारे दैनिक जीवन में अपरिहार्य हो चुका है। इसकी अनुकूलन क्षमता, उत्पादन की सुगमता और लचीलेपन ने इसे धातु का एक प्रभावी विकल्प बना दिया है। किंतु, यही गुण इसके संग्रह और पुन: उपयोग को प्रोत्साहित करने में सबसे बड़ी बाधा हैं। इसी विरोधाभास को दूर करने के लिए कड़े सरकारी नियमों की आवश्यकता महसूस की गई।

विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व का ढांचा

2022 से प्रभावी विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) शासन ने उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों (PIBOs) पर प्लास्टिक कचरे के प्रसंस्करण का कानूनी दायित्व डाला है:

  • तुलनात्मक लक्ष्य: 2021-22 में 35% संग्रह का लक्ष्य निर्धारित था, जिसे 2022-23 में 70% और 2024-25 तक 100% करने का अधिदेश था।
  • 2026 के नए अधिदेश: अब कंपनियों को केवल संग्रह करना है, बल्कि अपनी पैकेजिंग में पुनर्चक्रित सामग्री का न्यूनतम प्रतिशत भी सुनिश्चित करना होगा।
  • श्रेणी-वार लक्ष्य: उदाहरण के लिए, 'श्रेणी-I' पैकेजिंग में कम से कम 30% पुनर्चक्रित सामग्री अनिवार्य है, जिसे 2028-29 तक बढ़ाकर 60% किया जाना है।

नियमों का 'लचीलापन':

सबसे चिंताजनक पक्ष सरकार द्वारा नियमों में दी गई 'छूट' है। गजट अधिसूचना के अनुसार:

  • जो कंपनियां 2025-26 के लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल रहती हैं, वे अपने घाटे को अगले तीन वर्षों तक आगे बढ़ा सकती हैं।
  • शर्त केवल यह है कि उन्हें प्रतिवर्ष घाटे का कम से कम एक-तिहाई हिस्सा पूरा करना होगा।
  • इसका अर्थ है कि 2025-26 की पर्यावरणीय जवाबदेही को 2028-29 तक टाला जा सकता है, जो "प्रदूषक भुगतान करता है" के सिद्धांत को कमजोर करता है।

सांख्यिकीय वास्तविकता और कार्यान्वयन अंतराल

संसद में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, वर्तमान स्थिति संतोषजनक नहीं है:

  • संग्रह का स्तर: वर्तमान में कंपनियां अपने दायित्वों का केवल 50% से 60% ही संग्रह कर पा रही हैं।
  • लक्ष्यों का अभाव: 2025 और उसके बाद के वर्षों के लिए संग्रह के स्पष्ट लक्ष्यों की कमी यह संकेत देती है कि सरकार शायद कंपनियों पर दबाव बनाने से पीछे हट रही है।
  • बाजार निर्भरता: 'ट्रेडिंग सर्टिफिकेट' का उपयोग यह दर्शाता है कि सरकार पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान बाजार के अर्थशास्त्र पर छोड़ना चाहती है।

प्रमुख चुनौतियां

  • संसाधनों का हिसाब-किताब: संग्रह और पुनर्चक्रण लक्ष्यों के उचित लेखा-जोखा के बिना, पुन: उपयोग के नए लक्ष्यों की उपेक्षा होने का जोखिम है।
  • ईपीआर की प्रासंगिकता: लक्ष्यों का अत्यधिक लचीलापन ईपीआर शासन के मूल उद्देश्य को ही विफल कर सकता है।
  • व्यापारिक प्रमाणपत्र: नियमों में ट्रेडिंग सर्टिफिकेट का प्रावधान बाजार अर्थशास्त्र पर अत्यधिक निर्भर है, जो पर्यावरणीय समस्या को केवल एक व्यापारिक वस्तु बना सकता है।
  • डेटा का अभाव: कंपनियों द्वारा शत-प्रतिशत संग्रह के दावों की पुष्टि के लिए कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।
  • नीतिगत दीवार: ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार प्लास्टिक कचरा संग्रह को प्रभावी ढंग से लागू करने के प्रयासों में एक 'दीवार' से टकरा गई है, जिससे नियमों में बार-बार ढील दी जा रही है।

आगे की राह

  • सख्त ऑडिट: कंपनियों द्वारा किए गए दावों और वास्तविक संग्रह के बीच के अंतर को पाटने के लिए स्वतंत्र ऑडिट आवश्यक है।
  • पारदर्शिता: ट्रेडिंग सर्टिफिकेट और पुनर्चक्रित सामग्री के स्रोतों की स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक डोमेन में होनी चाहिए।
  • तकनीकी नवाचार: संग्रह को प्रोत्साहित करने के लिए 'रिवर्स लॉजिस्टिक्स' और 'सर्कुलर डिजाइन' में निवेश को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
  • बुनियादी ढांचे में निवेश: केवल नियमों को लचीला बनाने के बजाय स्थानीय निकायों के साथ मिलकर 'कचरा पृथक्करण' और 'संग्रह अवसंरचना' को मजबूत करना होगा।

निष्कर्ष

भारत के प्लास्टिक अपशिष्ट नियम एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं। नीतियों का 'लचीलापन' उद्योगों को राहत तो दे सकता है, लेकिन यह पर्यावरण की कीमत पर नहीं होना चाहिए। यदि प्लास्टिक संग्रह और पुनर्चक्रण के लक्ष्यों का उचित हिसाब-किताब नहीं रखा गया, तो 'स्वच्छ भारत' और 'संधारणीय विकास' का लक्ष्य केवल कागजी बनकर रह जाएगा। भारत को अपनी नियामक संरचना में 'लचीलेपन' के स्थान पर 'दृढ़ता' और 'जवाबदेही' को प्राथमिकता देनी होगी।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मांतरण भारत के सामाजिक-राजनीतिक विमर्श के सबसे संवेदनशील मुद्दे रहे हैं। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से उत्तर भारत में, 'संगठित नेटवर्क' के आरोपों और उनके विरुद्ध बढ़ते राज्य-विशिष्ट विधायी हस्तक्षेप ने इस विषय को पुनः राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। यह मुद्दा केवल व्यक्तिगत आस्था का नहीं, बल्कि भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने, व्यक्तिगत निजता और राज्य की शक्तियों के मध्य संतुलन का परिचायक है।

धर्मांतरण: विधिक एवं न्यायिक परिभाषा

विधिक दृष्टिकोण से, 'धर्मांतरण' का अर्थ अपनी वर्तमान धार्मिक पहचान को त्यागकर स्वेच्छा से दूसरे धर्म को अपनाना है। हालाँकि, भारतीय न्यायशास्त्र में इसकी व्याख्या अत्यंत सूक्ष्म है:

  • अनुच्छेद 25 बनाम प्रचार का अधिकार: संविधान धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देता है।
  • न्यायिक स्पष्टीकरण (रेव. स्टेनिसलॉस केस, 1977): सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि "प्रचार के अधिकार" का अर्थ अपने धर्म के सिद्धांतों को फैलाना है, लेकिन इसमें "दूसरों को धर्मांतरित करने का मौलिक अधिकार" शामिल नहीं है। न्यायालय के अनुसार, मौलिक अधिकार 'अंतरात्मा की स्वतंत्रता' पर आधारित है, जो प्रसार करने वाले और सुनने वाले दोनों के लिए समान है।

चर्चा के प्रमुख कारण

  • कथित संगठित नेटवर्क: उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में मुस्लिम समाज के कुछ वर्गों द्वारा संचालित कथित संगठित नेटवर्क की रिपोर्टें और उन पर जारी जांच।
  • वैवाहिक धर्मांतरण: 'विवाह हेतु धर्मांतरण' पर बढ़ता विधायी नियंत्रण, जिसे अक्सर 'लव जिहाद' के विमर्श के साथ जोड़कर देखा जाता है।
  • न्यायिक चुनौतियां: इलाहाबाद और गुजरात उच्च न्यायालयों सहित सर्वोच्च न्यायालय में इन कानूनों की संवैधानिक वैधता (निजता और व्यक्तिगत स्वायत्तता के आधार पर) को दी गई चुनौतियां।

संवैधानिक मर्यादा और सीमाएं

अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है। राज्य निम्नलिखित आधारों पर इस पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है:

  1. सार्वजनिक व्यवस्था
  2. नैतिकता
  3. स्वास्थ्य 

जबरन, प्रलोभन या धोखाधड़ी द्वारा किया गया धर्मांतरण इन सीमाओं का उल्लंघन माना जाता है और इसे रोकना राज्य का वैधानिक दायित्व है।

ऐतिहासिक विकास: ब्रिटिश काल से वर्तमान तक

धर्मांतरण का नियमन भारत में नया नहीं है:

  • औपनिवेशिक काल: रियासतों ने धर्मांतरण की निगरानी हेतु कानून बनाए थे (जैसे रायगढ़ 1936 और पटना 1942)
  • स्वतंत्रता के बाद: ईसाई मिशनरी गतिविधियों की प्रतिक्रिया में ओडिशा (1967) और मध्य प्रदेश (1968) जैसे राज्यों ने पहले एंटी-कन्वर्जन कानून बनाए।
  • अंबेडकर का प्रभाव: 1956 में डॉ. अंबेडकर का बौद्ध धर्म अपनाना दलित मुक्ति के इतिहास की सबसे बड़ी घटना थी, जो यह दर्शाती है कि धर्मांतरण अक्सर सामाजिक असमानता के विरुद्ध एक विद्रोह होता है।

राज्यवार कानून और दंड के प्रावधान

वर्तमान में विभिन्न विचारधारा वाली सरकारों ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए हैं:

  • कठोर संशोधन: उत्तर प्रदेश (2021) और उत्तराखंड (प्रस्तावित 2025) में दंड की अवधि को 10 वर्ष से बढ़ाकर आजीवन कारावास तक करने का प्रस्ताव है।
  • राजनैतिक आम सहमति: हिमाचल प्रदेश (2006 - कांग्रेस) और तमिलनाडु (2002 - AIADMK) के उदाहरण बताते हैं कि इस मुद्दे पर वैचारिक मतभेदों के बावजूद एक व्यापक राजनीतिक सहमति है कि 'धर्मांतरण का नियमन' आवश्यक है।

प्रमुख चुनौतियां

  • विजिलेंटिज्म: इन कानूनों की आड़ में गैर-राज्य तत्वों द्वारा की जाने वाली हिंसा और दखलअंदाजी।
  • निजता का अधिकार: क्या राज्य को यह पूछने का अधिकार है कि कोई व्यक्ति अपना धर्म क्यों बदल रहा है? यह पुट्टास्वामी निर्णय (निजता का अधिकार) के साथ संघर्ष की स्थिति पैदा करता है।
  • जांच बनाम उत्पीड़न: उत्तराखंड जैसे राज्यों के उदाहरण जहाँ बड़ी संख्या में मामले दर्ज हुए लेकिन बाद में साक्ष्यों के अभाव में खारिज कर दिए गए, जो कानून के संभावित दुरुपयोग की ओर संकेत करते हैं।

विश्लेषण

भारत में धर्मांतरण का मुद्दा 'स्वतंत्रता बनाम सुरक्षा' का द्वंद्व है। जहाँ स्वेच्छा से धर्म बदलना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है, वहीं बलपूर्वक या सामूहिक प्रलोभन द्वारा किया गया मतांतरण सामाजिक स्थिरता के लिए खतरा माना जाता है। चुनौती यह है कि "धोखाधड़ी को रोकने के प्रयास" कहीं "व्यक्तिगत पसंद के दमन" में बदल जाएं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उत्तर प्रदेश कानून के कुछ प्रक्रियात्मक पहलुओं (जैसे नोटिस की अनिवार्यता) पर व्यक्त की गई चिंताएं इसी संतुलन की ओर इशारा करती हैं।

आगे की राह

  • न्यायिक स्पष्टता: सर्वोच्च न्यायालय को इन कानूनों के उन प्रावधानों को स्पष्ट करना चाहिए जो निजता और व्यक्तिगत स्वायत्तता के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण करते हैं।
  • प्रशासनिक निष्पक्षता: पुलिस और प्रशासन को 'कथित' आरोपों और 'प्रमाणित' साक्ष्यों के बीच भेद करना चाहिए ताकि निर्दोषों का उत्पीड़न हो।
  • आंतरिक सुधार: जैसा कि मीनाक्षीपुरम (1981) के समय भी महसूस किया गया था, समाज को उन आंतरिक बुराइयों (जैसे जातिवाद) को दूर करना होगा जो लोगों को धर्मांतरण के लिए प्रेरित करती हैं।

निष्कर्ष

धर्मांतरण विरोधी कानून यदि धोखाधड़ी और बल प्रयोग को रोकने तक सीमित हैं, तो वे सार्वजनिक व्यवस्था के लिए आवश्यक हैं। किंतु, यदि वे व्यक्तिगत आस्था की अभिव्यक्ति में बाधक बनते हैं, तो वे भारत की धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक पहचान को कमजोर करते हैं। 'विकसित भारत' के लिए एक ऐसे वातावरण की आवश्यकता है जहाँ प्रत्येक नागरिक अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने के लिए स्वतंत्र हो और राज्य केवल उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करे।